रविवार, 4 अप्रैल 2021

*अखण्ड स्वास्थ्य* ८९.आत्मनिरीक्षण, भोजन

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 *अखण्ड स्वास्थ्य*

           ८९.

  *रोग के निदान हेतु आत्म निरीक्षण करो ।* 

☝️  हे मानव रोगों की जांच के लिए आप जगह-जगह भटकते हो, डॉक्टरों से पूछते हो, मशीन वालों के चक्कर काटते हो कि शायद रोग का पता लग जाए । लेकिन कभी तुम अपना आत्म विश्लेषण नहीं करते ,आत्म निरीक्षण नहीं करते कि मेरा रोग क्यों हुआ ।

👉 प्रकृति का नियम है या सामान्य संसारिक लोगों की प्रवृति है । कि मनुष्य को अपनी भूल दिखाई नहीं देती, वह दूसरों के दोष तो बड़ी आसानी से ढूंढ लेता है पर अपने दोषों की, अपनी कमियों की सदा उपेक्षा किया करता है । उधर ध्यान ही नहीं देता कि हम भूल कहां कर रहे हैं, हम गलती कहां कर रहे हैं । अपनी कमियों को देखने के लिए मनुष्य को आत्मचिंतन की और मुड़ना पड़ता है , अपनी चेतना का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर लगाना पड़ता है, अपनी ही जागृति करनी पड़ती है । जिस तरह से मनुष्य दूसरों के दोष देखता है, उनकी समीक्षाएं करता है  ऐसे यही कुशलता वह अपने दोषों को देखने में प्रयुक्त करने लगे तो मानव कल्याण पथ के पथ पर बढ़ सकता है , स्वस्थ जीवन के सारे मार्ग खुल सकते हैं । जो व्यक्ति अपनी कमियों को देखने ,उन्हें सुधारने की ओर अग्रसर है वह देर तक ,दुरावस्थाओं में ,रोग ग्रस्त अवस्था में, विपदाओं में घिरा नहीं रह सकेगा । यह सिद्धांत जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है ।

 भौतिक शरीर का स्वास्थ्य हो या हमारा मानसिक स्वास्थ्य अथवा आत्मिक स्वास्थ्य , सब जगह मानव आशातीत  प्रगति कर सकता है ।

👉हे मानव तुम्हारी आंतरिक दुर्बलता ही तुम्हारा रास्ता रोके रहती है और सबसे बड़ी तुम्हारी जीवन की बाधा यही है, इसको हटाने के लिए जिस क्षण तुम कृत संकल्प हो जाओगे, उसी क्षण तुम्हारे भाग्य के, अखंड स्वास्थ्य के राजमार्ग खुलते चले जाएंगे । अपनी पात्रता को विकसित करना पड़ेगा ,अपना सारा का सारा ध्यान अपनी इसी लक्ष्य पूर्ति पर लगाना पड़ेगा , चेतना को एक ही केंद्र पर केन्द्रित करना पड़ेगा ।

 अपना आत्म निरीक्षण, आत्मचिंतन, आत्म सुधार के इसी नियम का अनुपालन प्रकृति करती है ,सृष्टि के आदि से लेकर अब तक यह शाश्वत नियम चला रहा है भविष्य में भी चलता रहेगा , इसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता है ।

 वर्षा का पानी सब जगह समान रूप से बरसता है लेकिन जहां  गड्ढा व गहराई होगी उसी में पानी भरेगा व अपनी पात्रता के हिसाब से गहराई के हिसाब से जल को धारण करेगा ।

 ऐसे ही जो भी अपनी त्रुटियां ढूंढने और उन्हें खोज कर निकालने के लिए सक्रिय रहते हैं या रहेगें उनके स्वास्थ्य जीवन का राजमार्ग सामने खड़ा होगा ।

        *भोजन

☝️ हे मानव भोजन जीवन की रक्षा व शरीर के पोषण के लिए होता है और भोजन बनाने वाला उतना ही भोजन बनाता है जितना कि वह खा सके व पचा सके , उसमें भी अपनी आवश्यकता के हिसाब से हल्का या गरिष्ठ स्तर का बनाता है जो उन्हें परेशानी पैदा न करें व उसकी शारीरिक आवश्यकता के अनुरूप हो । अगर भोजन बनाने में अति की गई तो वह बासी रह कर विकृत होगा, खाने में अति बरती गई तो अर्जीण होकर के शरीर को रोग ग्रस्त कर देगा , विषैला बना देगा , ऐसे ही हे मानव ज्ञान की साधना व अध्ययन उतना ही किया जाए जो सहजता से जीवन में उतर जाए । जो अनावश्यक ज्ञान जीवन में काम नहीं आता है ऐसे ज्ञान को अगर मस्तिष्क में संग्रह किया गया तो अति भोजन की तरह दूषित होकर के जीवन के हर क्षेत्र को, मस्तिष्क को विकृत करेगा और अधिक ज्ञान जो प्राप्त करने के बाद मस्तिष्क में जाकर जीवन में उतर नहीं पाया, अपचित भोजन की तरह  अर्जीण रूपी रोग उत्पन्न करने के समान, मन में अहंकार पैदा करके  मस्तिष्क को विकृत कर डालेगा ।अत: अपने जीवन के लक्ष्य के अनुरूप ज्ञान की साधना करो और  ज्ञान के सहारे, उसके पथ पर अपने जीवन के लक्ष्य की ओर अनुगमन करो । इसीमें जीवन का कल्याण होगा और वही ज्ञान सार्थक व तुम्हारे लिए हितकर होगा ।

अतः अपनी गहन दृष्टि से आत्म चिंतन, आत्म मंथन करते हुए अपनी विकृतियों को जीवन से दूर करो और हटाने का संपूर्ण पुरुषार्थ करो, इसीसे आपके जीवन का कल्याण होगा, परिवार, समाज और राष्ट्र  का कल्याण होगा ।

🌏 *युग विद्या विस्तार योजना*

( मानवीय संस्कृति पर आधारित एक समग्र शिक्षण योजना)


शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

*अखण्ड स्वास्थ्य* ५१. डिंडोरी

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*अखण्ड स्वास्थ्य*

           ५१.

 *रोग के कारण* 

           २७.

  *प्रकृति की सफाई व्यवस्था में बाधा*

☝️ हमने आज से 50 वर्ष पहले अपने सामने, इन्हीं आंखों से देखा है कि लोग सामान्य अवस्था में बुखार, सर्दी, जुकाम, उल्टी, दस्त फोडे़- फुन्सी जो प्राथमिक चरण में होते है इनको कभी रोग नहीं मानते थे  जन सामान्य में मान्यता थी व उनका मानना था कि इस माध्यम से शरीर की गंदगी बाहर निकल रही है अतः इन्हें निकलने दो ।

☝️ आयुर्वेद में शरीर की शोधन क्रिया के लिए पंचकर्म विज्ञान के अंतर्गत वमन, विरेचन, लंघन, रक्त मोक्षण आदि तमाम प्रकार की प्रक्रियाओं का वर्णन आता है वे कृत्रिम शोधन  क्रियायें है ।

👉 मानव के शरीर में जब  विजातिय पदार्थ यानी विषैले तत्व अधिक बढ़ जाते हैं । आहार-विहार की गड़बड़ी से या भोजन में गए विषैले पदार्थ जो विभिन्न माध्यमों  से शरीर में पहुँच गये ।

 ☝️प्रकृति उस जहर को शरीर से बाहर निकलने का उपक्रम करती है ।

👉जब शरीर में गंदगी बढ़ जाती है तो वायु प्रबल होकर के दस्तों के द्वारा उस गंदगी को बाहर निकालने की प्रक्रिया संपन्न करती है । 

👉पित्त बढ़ जाता है दूषित पदार्थ आमाशय में इकट्ठे होते हैं तो भूख लगना बंद हो जाती है, एसिडिटी बढ़ जाती है, पेट में जलन होने लगती है तो प्रकृति उन्हें वमन के द्वारा बाहर निकालने की कोशिश करती है ,जी मचलना ,सिर दर्द होना, सुस्ती आना, मुंह सूखना, मुंह में पानी आना, खट्टापन लगना पहले ये सब लक्षण प्रकट होते हैं उसके बाद उल्टियां शुरू हो जाती है प्राचीन समय में सभी समझदार लोग गुनगुना पानी पी कर जल्दी जल्दी  उल्टियां होने देते और शरीर का सारा जहर बाहर निकाल देते थे और ऐसे ही सर्दी जुखाम बहती तो उसको रोकते नहीं थे उसको पूरी तरह बहा कर के 3 दिन के अंदर में बढ़े हुए कफ को निकालकर शरीर का संतुलन बना देते ।

☝️लेकिन वर्तमान के युग में, इन 50 वर्षों में जब से एलोपैथिक दवाइयां आयी व इन दवाइयों का ऐसा प्रचार किया, सिर का दर्द हुआ तो आनंद कर लो, एना सीन लो इतनी विभिन्न प्रकार की दवाइयों का प्रचार किया और आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा ने भी ऐसी दवाई बनायी जो जरा सा कुछ हुआ नहीं कि उसकी गोली ले ली और  उपद्रव बंद। इंजेक्शन लगाया समस्या बंद ।

👉 इस तरह मानव ने प्रकृति की सफाई व्यवस्था को बंद करके  शरीर में विषों को रुकने का मार्ग प्रशस्त कर दिया, रास्ता साफ कर दिया और शरीर में रूके व बढ़े विषैले तत्वों ने असाध्य और भयंकर बीमारियों को जन्म दिया । दवाइयों के, जांचों के, बीमारियों के जाल में पूरी विश्व मानवता बुरी तरह फंस चुकी है और इन औषधियों के बाजार ने मानव को अज्ञान के गहन अंधकार में धकेल कर समाज फैले, जन जन में प्रविष्ठ आयुर्वेद के मूल ज्ञान व जीवन विज्ञान के मूल सिद्धांतो का विनाश कर डाला ।

☝️ आज यह देश और यह दुनिया आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों से पूरी तरह अपरिचित हो गयी है । इनका वैचारिक स्तर, इनके चिंतन का स्तर, इनके ज्ञान का स्तर गिरा ही नहीं बल्कि उल्टा हो गया ।

👉जो शरीर के लिए हितकर था *उसे बीमारी मान बैठे* और जो अहित कर था *उसे उपचार मान बैठे* 

☝️यही विश्व  मानवता का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है और जब तक इस दुर्भाग्य की अज्ञान की सीमा से मानव का चिंतन बाहर नहीं निकलेगा । आयुर्विज्ञान के सिद्धांतों की और नहीं लौटेगा तब तक संसार की कोई भी अस्पताल, कोई भी डॉक्टर, कोई भी चिकित्सा पद्धति व कोई भी औषधि मानव को स्वास्थ्य प्रदान नहीं कर सकेगी । 

   *याद रखो* 

 ☝️जब भी विश्व मानवता को, संसार के लोगों को रोग मुक्त जीवन की चाह होगी, स्वास्थ्य जीवन की चाह होगी, तो उसे इस मान्यता को बदलना ही पड़ेगा व प्रकृति के इशारों को समझना ही  पड़ेगा ,अपनी गलत मान्यताओं को छोडना ही  पड़ेगा और औषधि और चिकित्सा के वर्तमान ढांचे से अपना मुंह मोडना ही पड़ेगा ।

 तभी उनका कल्याण होगा ।

🌏 *युग विद्या विस्तार योजना* 

(मानवीय संस्कृति पर आधारित एक समग्र शिक्षण योजना)

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