रविवार, 4 अप्रैल 2021

*अखण्ड स्वास्थ्य* ८९.आत्मनिरीक्षण, भोजन

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 *अखण्ड स्वास्थ्य*

           ८९.

  *रोग के निदान हेतु आत्म निरीक्षण करो ।* 

☝️  हे मानव रोगों की जांच के लिए आप जगह-जगह भटकते हो, डॉक्टरों से पूछते हो, मशीन वालों के चक्कर काटते हो कि शायद रोग का पता लग जाए । लेकिन कभी तुम अपना आत्म विश्लेषण नहीं करते ,आत्म निरीक्षण नहीं करते कि मेरा रोग क्यों हुआ ।

👉 प्रकृति का नियम है या सामान्य संसारिक लोगों की प्रवृति है । कि मनुष्य को अपनी भूल दिखाई नहीं देती, वह दूसरों के दोष तो बड़ी आसानी से ढूंढ लेता है पर अपने दोषों की, अपनी कमियों की सदा उपेक्षा किया करता है । उधर ध्यान ही नहीं देता कि हम भूल कहां कर रहे हैं, हम गलती कहां कर रहे हैं । अपनी कमियों को देखने के लिए मनुष्य को आत्मचिंतन की और मुड़ना पड़ता है , अपनी चेतना का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर लगाना पड़ता है, अपनी ही जागृति करनी पड़ती है । जिस तरह से मनुष्य दूसरों के दोष देखता है, उनकी समीक्षाएं करता है  ऐसे यही कुशलता वह अपने दोषों को देखने में प्रयुक्त करने लगे तो मानव कल्याण पथ के पथ पर बढ़ सकता है , स्वस्थ जीवन के सारे मार्ग खुल सकते हैं । जो व्यक्ति अपनी कमियों को देखने ,उन्हें सुधारने की ओर अग्रसर है वह देर तक ,दुरावस्थाओं में ,रोग ग्रस्त अवस्था में, विपदाओं में घिरा नहीं रह सकेगा । यह सिद्धांत जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है ।

 भौतिक शरीर का स्वास्थ्य हो या हमारा मानसिक स्वास्थ्य अथवा आत्मिक स्वास्थ्य , सब जगह मानव आशातीत  प्रगति कर सकता है ।

👉हे मानव तुम्हारी आंतरिक दुर्बलता ही तुम्हारा रास्ता रोके रहती है और सबसे बड़ी तुम्हारी जीवन की बाधा यही है, इसको हटाने के लिए जिस क्षण तुम कृत संकल्प हो जाओगे, उसी क्षण तुम्हारे भाग्य के, अखंड स्वास्थ्य के राजमार्ग खुलते चले जाएंगे । अपनी पात्रता को विकसित करना पड़ेगा ,अपना सारा का सारा ध्यान अपनी इसी लक्ष्य पूर्ति पर लगाना पड़ेगा , चेतना को एक ही केंद्र पर केन्द्रित करना पड़ेगा ।

 अपना आत्म निरीक्षण, आत्मचिंतन, आत्म सुधार के इसी नियम का अनुपालन प्रकृति करती है ,सृष्टि के आदि से लेकर अब तक यह शाश्वत नियम चला रहा है भविष्य में भी चलता रहेगा , इसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता है ।

 वर्षा का पानी सब जगह समान रूप से बरसता है लेकिन जहां  गड्ढा व गहराई होगी उसी में पानी भरेगा व अपनी पात्रता के हिसाब से गहराई के हिसाब से जल को धारण करेगा ।

 ऐसे ही जो भी अपनी त्रुटियां ढूंढने और उन्हें खोज कर निकालने के लिए सक्रिय रहते हैं या रहेगें उनके स्वास्थ्य जीवन का राजमार्ग सामने खड़ा होगा ।

        *भोजन

☝️ हे मानव भोजन जीवन की रक्षा व शरीर के पोषण के लिए होता है और भोजन बनाने वाला उतना ही भोजन बनाता है जितना कि वह खा सके व पचा सके , उसमें भी अपनी आवश्यकता के हिसाब से हल्का या गरिष्ठ स्तर का बनाता है जो उन्हें परेशानी पैदा न करें व उसकी शारीरिक आवश्यकता के अनुरूप हो । अगर भोजन बनाने में अति की गई तो वह बासी रह कर विकृत होगा, खाने में अति बरती गई तो अर्जीण होकर के शरीर को रोग ग्रस्त कर देगा , विषैला बना देगा , ऐसे ही हे मानव ज्ञान की साधना व अध्ययन उतना ही किया जाए जो सहजता से जीवन में उतर जाए । जो अनावश्यक ज्ञान जीवन में काम नहीं आता है ऐसे ज्ञान को अगर मस्तिष्क में संग्रह किया गया तो अति भोजन की तरह दूषित होकर के जीवन के हर क्षेत्र को, मस्तिष्क को विकृत करेगा और अधिक ज्ञान जो प्राप्त करने के बाद मस्तिष्क में जाकर जीवन में उतर नहीं पाया, अपचित भोजन की तरह  अर्जीण रूपी रोग उत्पन्न करने के समान, मन में अहंकार पैदा करके  मस्तिष्क को विकृत कर डालेगा ।अत: अपने जीवन के लक्ष्य के अनुरूप ज्ञान की साधना करो और  ज्ञान के सहारे, उसके पथ पर अपने जीवन के लक्ष्य की ओर अनुगमन करो । इसीमें जीवन का कल्याण होगा और वही ज्ञान सार्थक व तुम्हारे लिए हितकर होगा ।

अतः अपनी गहन दृष्टि से आत्म चिंतन, आत्म मंथन करते हुए अपनी विकृतियों को जीवन से दूर करो और हटाने का संपूर्ण पुरुषार्थ करो, इसीसे आपके जीवन का कल्याण होगा, परिवार, समाज और राष्ट्र  का कल्याण होगा ।

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शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

*अखण्ड स्वास्थ्य* ५१. डिंडोरी

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*अखण्ड स्वास्थ्य*

           ५१.

 *रोग के कारण* 

           २७.

  *प्रकृति की सफाई व्यवस्था में बाधा*

☝️ हमने आज से 50 वर्ष पहले अपने सामने, इन्हीं आंखों से देखा है कि लोग सामान्य अवस्था में बुखार, सर्दी, जुकाम, उल्टी, दस्त फोडे़- फुन्सी जो प्राथमिक चरण में होते है इनको कभी रोग नहीं मानते थे  जन सामान्य में मान्यता थी व उनका मानना था कि इस माध्यम से शरीर की गंदगी बाहर निकल रही है अतः इन्हें निकलने दो ।

☝️ आयुर्वेद में शरीर की शोधन क्रिया के लिए पंचकर्म विज्ञान के अंतर्गत वमन, विरेचन, लंघन, रक्त मोक्षण आदि तमाम प्रकार की प्रक्रियाओं का वर्णन आता है वे कृत्रिम शोधन  क्रियायें है ।

👉 मानव के शरीर में जब  विजातिय पदार्थ यानी विषैले तत्व अधिक बढ़ जाते हैं । आहार-विहार की गड़बड़ी से या भोजन में गए विषैले पदार्थ जो विभिन्न माध्यमों  से शरीर में पहुँच गये ।

 ☝️प्रकृति उस जहर को शरीर से बाहर निकलने का उपक्रम करती है ।

👉जब शरीर में गंदगी बढ़ जाती है तो वायु प्रबल होकर के दस्तों के द्वारा उस गंदगी को बाहर निकालने की प्रक्रिया संपन्न करती है । 

👉पित्त बढ़ जाता है दूषित पदार्थ आमाशय में इकट्ठे होते हैं तो भूख लगना बंद हो जाती है, एसिडिटी बढ़ जाती है, पेट में जलन होने लगती है तो प्रकृति उन्हें वमन के द्वारा बाहर निकालने की कोशिश करती है ,जी मचलना ,सिर दर्द होना, सुस्ती आना, मुंह सूखना, मुंह में पानी आना, खट्टापन लगना पहले ये सब लक्षण प्रकट होते हैं उसके बाद उल्टियां शुरू हो जाती है प्राचीन समय में सभी समझदार लोग गुनगुना पानी पी कर जल्दी जल्दी  उल्टियां होने देते और शरीर का सारा जहर बाहर निकाल देते थे और ऐसे ही सर्दी जुखाम बहती तो उसको रोकते नहीं थे उसको पूरी तरह बहा कर के 3 दिन के अंदर में बढ़े हुए कफ को निकालकर शरीर का संतुलन बना देते ।

☝️लेकिन वर्तमान के युग में, इन 50 वर्षों में जब से एलोपैथिक दवाइयां आयी व इन दवाइयों का ऐसा प्रचार किया, सिर का दर्द हुआ तो आनंद कर लो, एना सीन लो इतनी विभिन्न प्रकार की दवाइयों का प्रचार किया और आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा ने भी ऐसी दवाई बनायी जो जरा सा कुछ हुआ नहीं कि उसकी गोली ले ली और  उपद्रव बंद। इंजेक्शन लगाया समस्या बंद ।

👉 इस तरह मानव ने प्रकृति की सफाई व्यवस्था को बंद करके  शरीर में विषों को रुकने का मार्ग प्रशस्त कर दिया, रास्ता साफ कर दिया और शरीर में रूके व बढ़े विषैले तत्वों ने असाध्य और भयंकर बीमारियों को जन्म दिया । दवाइयों के, जांचों के, बीमारियों के जाल में पूरी विश्व मानवता बुरी तरह फंस चुकी है और इन औषधियों के बाजार ने मानव को अज्ञान के गहन अंधकार में धकेल कर समाज फैले, जन जन में प्रविष्ठ आयुर्वेद के मूल ज्ञान व जीवन विज्ञान के मूल सिद्धांतो का विनाश कर डाला ।

☝️ आज यह देश और यह दुनिया आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों से पूरी तरह अपरिचित हो गयी है । इनका वैचारिक स्तर, इनके चिंतन का स्तर, इनके ज्ञान का स्तर गिरा ही नहीं बल्कि उल्टा हो गया ।

👉जो शरीर के लिए हितकर था *उसे बीमारी मान बैठे* और जो अहित कर था *उसे उपचार मान बैठे* 

☝️यही विश्व  मानवता का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है और जब तक इस दुर्भाग्य की अज्ञान की सीमा से मानव का चिंतन बाहर नहीं निकलेगा । आयुर्विज्ञान के सिद्धांतों की और नहीं लौटेगा तब तक संसार की कोई भी अस्पताल, कोई भी डॉक्टर, कोई भी चिकित्सा पद्धति व कोई भी औषधि मानव को स्वास्थ्य प्रदान नहीं कर सकेगी । 

   *याद रखो* 

 ☝️जब भी विश्व मानवता को, संसार के लोगों को रोग मुक्त जीवन की चाह होगी, स्वास्थ्य जीवन की चाह होगी, तो उसे इस मान्यता को बदलना ही पड़ेगा व प्रकृति के इशारों को समझना ही  पड़ेगा ,अपनी गलत मान्यताओं को छोडना ही  पड़ेगा और औषधि और चिकित्सा के वर्तमान ढांचे से अपना मुंह मोडना ही पड़ेगा ।

 तभी उनका कल्याण होगा ।

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(मानवीय संस्कृति पर आधारित एक समग्र शिक्षण योजना)

👏 मां नर्मदा के पावन चरणों में, अमरकंटक के पावन आध्यात्मिक क्षेत्र में

📡 मेकलसूता ऋषि विज्ञान स्वास्थ्य संरक्षण केंद्र, आरोग्य ग्राम

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सोमवार, 15 मार्च 2021

*अखण्ड स्वास्थ्य ७४. भ्रांत धारणायें

 🔮📖💥📖🔮

*अखण्ड स्वास्थ्य*

           ७४.

  *भ्रांत धारणायें*

           १०.

 *जांचों का लंबा-चौड़ा कार बार एक बडा़ भ्रांत जाल* 

☝️ आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने रोग निदान के अनेक  आविष्कार किये है आविष्कार कर्ताओं ने तो अविष्कार मानवता के हितार्थ ही किए, लेकिन बाजार वादियों ने गलत लोगों ने उनका दुरुपयोग भी कम नहीं किया ।

एलोपैथिक की दुनिया में जब औषधियों का असर कम होना शुरू हो गया या उसके साइड इफेक्ट आना शुरू हो गए, दुष्परिणाम आना शुरू हो गए तो धंधे बाजों ने अपने धंधे के विस्तार के लिए जांचों का इतना लंबा चौड़ा बाजार खड़ा कर दिया जिसमें किसी भी रोगी का कोई उपचार तो होता नहीं पर जांचों ही जांचों में उनकी अकूत संपदा जेब खाली हो जाती है, खून पसीने की कमाई चली जाती है और हां कुछ जांचें ऐसी है जो आधुनिक रोग निदान में बड़ी सहायक हुई जिससे खून का हीमोग्लोबिन ,क्रिएटनीन, यूरिया, टीएलसी, डीएलसी, यूरिक एसिड, लाल कण, श्वेत कण ,शूगर लेबल व ऐसी कुछ और जांचे हैं जो  रोग की स्थिति का सही निदान कर देती है । लेकिन धंधेबाजों ने जांचों का इतना लंबा चौड़ा जाल बढ़ा दिया है ताकि उस आधार पर इनके यंत्र, उनके केमिकल बिकते रहे व उनसे संबंधित सामग्रियां बिकती रहे और इस आधार पर अरबों खरबों का बाजार खड़ा हो गया और आज चिकित्सक को , डॉक्टर को दवा और उपचार करने से ज्यादा रुचि जांचों में हो गई क्योंकि खुला कमीशन इस क्षेत्र में लेबोरेटरी के साथ डॉक्टरों का बंधा रहता है जो कहने की जरूरत नहीं है यदि डॉक्टर अपनी फीस न भी लें तो भी वह जांचों में इतना धन कमा लेते हैं जो सोचा नहीं जा सकता है  इसके अलावा इतने षड्यंत्र और गलत कार्य 

इस व्यवस्था तंत्र में होते हैं जिसको मैं आपको बता नहीं सकता उसकी कोई सीमा नहीं । यह एक बहुत कड़वा सत्य  है हो सकता हमारे चिकित्सा जगत के बंधुओं को बहुत कठोर लगे लेकिन यह एक नग्न  कटु सत्य है । समाज की मजबूरियां हैं कि वह बेचारा कुछ कर नहीं सकता जो डॉक्टरों के ऊपर आश्रित है जो वह कहता है वह करना पड़ता है लेकिन इन जांचों के भारी बाजार से मानव का लाभ बिल्कुल नहीं होता रोगी का लाभ बिल्कुल नहीं होता और केवल जांच जांच में उसकी जेब खाली हो जाती है उपचार तो बाद की वस्तु है ।

आयुर्वेद के मूल सिद्धांत और तीन आधारों को लेकर ही ऋषियों ने संपूर्ण शरीर के स्वास्थ्य विज्ञान को आधार दे दिया और इन तीनों के शमन व शोधन पर ही संपूर्ण मानव का स्वास्थ्य टिका हुआ है और इसी आधार को लेकर आहार क्रम, औषधि उपचार, शोधन क्रिया की व्यवस्था करा दी जाती है तो मानव की समस्त आधी - व्याधियां जड़ से मिट जाती है अतः आप इस भ्रांत धारणा से बाहर निकले की चांजों से कुछ भला होगा । इतनी लंबी चौड़ी जांचों की लिस्ट बन चुकी है कि मेडिकल की दुनियां में जब आप जांच करने जाओगे तो डॉ कोई न कोई चीज की आपको कमी निकाल देगा और कमी के आधार पर रोगी के अंदर में एक मानसिक भय बैठ जाता है कि मेरे अंदर तो यह कमी हो गयी उसकी पूर्ति कैसे हो फिर उसी के विटामिन की गोलियां, उनके केमिकल की गोलियां शरीर में पहुंचाई जाती है जबकि एकदम सत्य है यह है कि जो कुछ शरीर में मिलता है वह आपके पाचन के द्वारा, रसों के द्वारा ही मिलता है ये केमिकल की दवाइयां शरीर में जाकर कोई बहुत अधिक लाभ नहीं देती है बल्कि भारी दुष्परिणाम उत्पन्न करती है अत: इनकी लंबी चौड़ी जांच की दुनियां की धारणा से बाहर निकले , जो अति आवश्यक जांचे हैं जिनसे मानव की समस्याओं का निदान होता है जिसका उपयोग सभी क्षेत्रों में किया जाता है वहां तक तो ठीक है लेकिन इनका बाजार संभवत हजारों की संख्या में अगले दिन में पहुंच जाएगा । यह एक धोखाधड़ी का तंत्र है जिसकी तरफ ध्यान न समाज का है न सरकारों का है और इस जांच तंत्र के माध्यम से विश्व मानवता की लूट हो रही है आप इस धारणा से बाहर निकलकर आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों का ज्ञान लीजिए तभी आप अपने परिवार को ,अपने स्वास्थ्य को, अपने समाज को सुरक्षित रख पाएंगे वरना उपचार तो दूर की बात है आपकी मानसिक स्थिति भी भय से विकृत होती चली जाएगी क्योंकि चिकित्सक जांच कराता है तो कोई न कोई तो कमी शरीर में कम ज्यादा निकाल दी जायेगी या निकल  जायेगी है और उस आधार पर आपको एक मानसिक परेशानी अलग पैदा हो जायेगी अत: जांच धारणा से बाहर निकलिए वरना आपका स्वास्थ्य सुधरना तो दूर रहा इन जांच में ही आपकी जेब खाली होती चली जाएगी और धंधे वालों का धंधा शानदार तरीके से चलता चला जा रहा है और चलता चला जाएगा ।

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*अखण्ड स्वास्थ्य* ७५ रोग आपका शत्रु नही


*अखण्ड स्वास्थ्य*

           ७५.

 *अपनी मान्यतायें बदलिये*

             १.

 रोग आपका शत्रु नही

*अखण्ड स्वास्थ्य*

           ७५.

 *अपनी मान्यतायें बदलिये*

             १.

 *रोग आपका शत्रु नहीं है*

☝️ हे मानव रोग आपके पास मित्रवत् बनकर आता है , सावधान करने के लिए आता है कि शरीर में विकृति आ गई है, गंदगी आ गई है ,उसको साफ नहीं करोगे हटाओगे नहीं तो जीवन संकट में पड़ जाएगा , इस ओर जब तुम ध्यान नहीं देते तो प्रकृति अपने रोग रूपी दूतों को भेजकर तुम्हें सावधान ही करती हैं और उन रोग रूपी दूतों को सफाई में भी लगाती है , लेकिन तुम अपनी अज्ञानता के कारण मूर्खता के कारण अपना दुश्मन मान कर उनको हटाने का प्रयास करते हो, रोकने का प्रयास करते हो, प्रकृति आपको बीमार नहीं होने देना चाहती है जो लोग प्रकृति के पास रहते हैं उसके सानिध्य में रहते हैं, साहचर्य में रहते हैं और उनके नियमों का पालन करते हैं उन्हें यह बीमार नहीं पड़ने देती है। बीमार पड़ने पर प्रकृति हमारी गलतियों को सुधारने का उपक्रम करती है ।

👉 हे मानव रोग प्रकृति की वह क्रिया है जिसके द्वारा वह हमारी आंतरिक सफाई का काम करती है । रोग हमारा मित्र बनकर आता है और हमें यह बताता है कि हमने शरीर के साथ न्याय नहीं किया अन्याय किया है और विकृतियों को पनपने का स्थान देकर के विषों को एकत्रित कर लिया है । रोग उस आंतरिक विकारों की उपस्थिति का प्रतीक है ,मलों का प्रतीक है रोग  हमें उसकी सूचना देने  आया है रोग हमें यह संदेश देने आए हैं कि मानव तुम अपनी गलतियों को सुधारो, सावधान हो जाओ और तुम्हारे अंदर स्थित गंदगी को विषों को, विजातिय द्रव्योंं का शोधन करो, व प्राकृतिक जीवन की ओर लौट जाओ । आज के मनुष्य को देखो शिक्षित ,अशिक्षित से लेकर अति शिक्षित हर प्राणी बुरी तरह रोग ग्रस्त है पर उनके कारणों को समझने की चेष्टा नहीं करता है । प्रकृति बीमारियों के कारण को अपनी ओर से ठीक करने की व्यवस्था करती है तो हम दवा दे कर के उसके कार्य में बाधा ही डालते हैं और उस प्रकृति के काम को रोक देते हैं और आधुनिक भाषा में उसे हम चिकित्सा कहते हैं । आज की दुनिया में देखा जाए तो दवा इंजेक्शन आदि से तात्कालिक लाभ दिखता भर है पर वह जीवन की रक्षा के लिए स्वास्थ्य के लिए घातक बनते चले जा रहे हैं ।👉याद रखो

 जिस कारण से रोग उत्पन्न हुए हैं उन कारण को हटाए बिना एक भी रोग ठीक होने वाला नहीं है शरीर में रोग उत्पन्न होते ही सबसे पहले यह मालूम कीजिए, इस बात पर चिंतन कीजिए कि ये शरीर में उत्पन्न रोग के कारण कीटाणु जीवाणु विषाणु उत्पन्न क्यों हुये है? क्यों हम बीमार पड़े? प्रकृति के किस नियम को हमने छोड़ दिया ? और इस तरह से रोक के मूल कारण को समझ लेना ही आपके चिकित्सा का मूल आधार बनेगा ,रोग शरीर में उपस्थित  विजातिय तत्वों का प्रतिकार करने हटाने के लिए प्रकट होता है और आपकी विषम अवस्था का अंत कर देता है । शरीर में रोग इसलिए उत्पन्न होता है कि सफाई के लिए उसकी शरीर को आवश्यकता है । उस समय आपकी भूख बंद हो जाएगी ,प्यास बंद हो जाएगी, जी मचलना, उल्टी दस्त होना, यह रोग के द्वारा स्वास्थ्य लाभ करने का उपाय है, रोग के माध्यम से जब शारीरिक विकार बाहर निकाल दिये जाते है तो मनुष्य हल्का-फुल्का, स्वस्थ, प्रसन्न चित्त हो जाता है ।

जिसे हम बाहर से रोग के लक्षण देखते हैं वह उसकी स्वाभाविक प्रक्रिया है । किसी व्यक्ति को जुकाम लगी तो बढ़ा हुआ कफ निकल रहा है , फोड़ा हुआ तो खून में घुली हुई गंदगी निकल रही है । दस्त लगी तो आंतों में पड़ा हुआ दूषित मल निकल रहा है । प्राकृतिक चिकित्सा की भाषा में यह रोग नहीं है रोगों के लक्षण मात्र है और इन रोगों के द्वारा उपद्रव से शरीर की आंतरिक विकृतियों का हमें बोध होता है ।

👉 हे मनुष्य तुम्हें रोगों के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलना होगा ,हम रोगों को शत्रु नहीं मित्र माने और रोगों को देखकर निराशावादी और दु:खी होने की अपेक्षा हमें प्रसन्न होना चाहिए हमें विश्वास होना चाहिए कि यह बीमारी हमें स्वस्थ करेगी, संचित विकारों को निकालकर शरीर को  भीतर से शुद्ध कर देगी और यह शरीर के लिए  लाभदायक ही सिद्ध होगी । यह मानसिक परिवर्तन प्राकृतिक व्यवस्था का सहकारी सहयोगी है और इस रोग रूपी उपद्रव को देखकर जो व्यक्ति स्वास्थ्य के प्रति जितना आशावादी होगा, सुखद कल्पनाओं को करेगा, मधुर विचारों को मन में रखेगा उन्हें रोग शत्रु नहीं मित्र प्रतीत होगा ।

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 888 9193 577 शत्रु नहीं है*

☝️ हे मानव रोग आपके पास मित्रवत् बनकर आता है , सावधान करने के लिए आता है कि शरीर में विकृति आ गई है, गंदगी आ गई है ,उसको साफ नहीं करोगे हटाओगे नहीं तो जीवन संकट में पड़ जाएगा , इस ओर जब तुम ध्यान नहीं देते तो प्रकृति अपने रोग रूपी दूतों को भेजकर तुम्हें सावधान ही करती हैं और उन रोग रूपी दूतों को सफाई में भी लगाती है , लेकिन तुम अपनी अज्ञानता के कारण मूर्खता के कारण अपना दुश्मन मान कर उनको हटाने का प्रयास करते हो, रोकने का प्रयास करते हो, प्रकृति आपको बीमार नहीं होने देना चाहती है जो लोग प्रकृति के पास रहते हैं उसके सानिध्य में रहते हैं, साहचर्य में रहते हैं और उनके नियमों का पालन करते हैं उन्हें यह बीमार नहीं पड़ने देती है। बीमार पड़ने पर प्रकृति हमारी गलतियों को सुधारने का उपक्रम करती है ।

👉 हे मानव रोग प्रकृति की वह क्रिया है जिसके द्वारा वह हमारी आंतरिक सफाई का काम करती है । रोग हमारा मित्र बनकर आता है और हमें यह बताता है कि हमने शरीर के साथ न्याय नहीं किया अन्याय किया है और विकृतियों को पनपने का स्थान देकर के विषों को एकत्रित कर लिया है । रोग उस आंतरिक विकारों की उपस्थिति का प्रतीक है ,मलों का प्रतीक है रोग  हमें उसकी सूचना देने  आया है रोग हमें यह संदेश देने आए हैं कि मानव तुम अपनी गलतियों को सुधारो, सावधान हो जाओ और तुम्हारे अंदर स्थित गंदगी को विषों को, विजातिय द्रव्योंं का शोधन करो, व प्राकृतिक जीवन की ओर लौट जाओ । आज के मनुष्य को देखो शिक्षित ,अशिक्षित से लेकर अति शिक्षित हर प्राणी बुरी तरह रोग ग्रस्त है पर उनके कारणों को समझने की चेष्टा नहीं करता है । प्रकृति बीमारियों के कारण को अपनी ओर से ठीक करने की व्यवस्था करती है तो हम दवा दे कर के उसके कार्य में बाधा ही डालते हैं और उस प्रकृति के काम को रोक देते हैं और आधुनिक भाषा में उसे हम चिकित्सा कहते हैं । आज की दुनिया में देखा जाए तो दवा इंजेक्शन आदि से तात्कालिक लाभ दिखता भर है पर वह जीवन की रक्षा के लिए स्वास्थ्य के लिए घातक बनते चले जा रहे हैं ।👉याद रखो

 जिस कारण से रोग उत्पन्न हुए हैं उन कारण को हटाए बिना एक भी रोग ठीक होने वाला नहीं है शरीर में रोग उत्पन्न होते ही सबसे पहले यह मालूम कीजिए, इस बात पर चिंतन कीजिए कि ये शरीर में उत्पन्न रोग के कारण कीटाणु जीवाणु विषाणु उत्पन्न क्यों हुये है? क्यों हम बीमार पड़े? प्रकृति के किस नियम को हमने छोड़ दिया ? और इस तरह से रोक के मूल कारण को समझ लेना ही आपके चिकित्सा का मूल आधार बनेगा ,रोग शरीर में उपस्थित  विजातिय तत्वों का प्रतिकार करने हटाने के लिए प्रकट होता है और आपकी विषम अवस्था का अंत कर देता है । शरीर में रोग इसलिए उत्पन्न होता है कि सफाई के लिए उसकी शरीर को आवश्यकता है । उस समय आपकी भूख बंद हो जाएगी ,प्यास बंद हो जाएगी, जी मचलना, उल्टी दस्त होना, यह रोग के द्वारा स्वास्थ्य लाभ करने का उपाय है, रोग के माध्यम से जब शारीरिक विकार बाहर निकाल दिये जाते है तो मनुष्य हल्का-फुल्का, स्वस्थ, प्रसन्न चित्त हो जाता है ।

जिसे हम बाहर से रोग के लक्षण देखते हैं वह उसकी स्वाभाविक प्रक्रिया है । किसी व्यक्ति को जुकाम लगी तो बढ़ा हुआ कफ निकल रहा है , फोड़ा हुआ तो खून में घुली हुई गंदगी निकल रही है । दस्त लगी तो आंतों में पड़ा हुआ दूषित मल निकल रहा है । प्राकृतिक चिकित्सा की भाषा में यह रोग नहीं है रोगों के लक्षण मात्र है और इन रोगों के द्वारा उपद्रव से शरीर की आंतरिक विकृतियों का हमें बोध होता है ।

👉 हे मनुष्य तुम्हें रोगों के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलना होगा ,हम रोगों को शत्रु नहीं मित्र माने और रोगों को देखकर निराशावादी और दु:खी होने की अपेक्षा हमें प्रसन्न होना चाहिए हमें विश्वास होना चाहिए कि यह बीमारी हमें स्वस्थ करेगी, संचित विकारों को निकालकर शरीर को  भीतर से शुद्ध कर देगी और यह शरीर के लिए  लाभदायक ही सिद्ध होगी । यह मानसिक परिवर्तन प्राकृतिक व्यवस्था का सहकारी सहयोगी है और इस रोग रूपी उपद्रव को देखकर जो व्यक्ति स्वास्थ्य के प्रति जितना आशावादी होगा, सुखद कल्पनाओं को करेगा, मधुर विचारों को मन में रखेगा उन्हें रोग शत्रु नहीं मित्र प्रतीत होगा ।

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शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

आपलेच मीठ परक्यांच्या हातून खायचे का? सत्याग्रही विचारधारा ऑक्टोंबर1993

 

आपलेच मीठ परक्यांच्या हातून खायचे का?

सत्याग्रही विचारधारा ऑक्टोंबर1993 (यशवंत)

दि 19 मे 1993 पासून कांडला बंदरात दुसरा मीठ सत्याग्रह सुरू झाला आहे. अमेरिकन कारगील या बहुराष्ट्रीय कंपनीला भारत सरकारने मीठ बनविण्याकरीता कांडला बंदरातील 15000 एकर जागा दिली आहे. पोर्ट ट्रस्टच्या मालकीत असलेली ही जागा पोर्ट ट्रस्टच्या बैठकीला कारगील कंपनीला जागा न देण्याचा ठराव झाला असतानादेखील भारत सरकारने कोणाच्या दबावाखाली ही जागा दिली असेल ही गोष्ट सध्याच्या आर्थिक धोरणाकडे पाहिले असता. स्पष्ट दिसू शकते. जेव्हापासून नरसिंहराव सरकार केंद्रात बसले आहे तेव्हापासून आमच्यावर जागतिक बॅंक, आंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, बहुराष्ट्रीय कंपन्या, अमेरिका, जपान व युरोपियन देशांचा दबाव वाढत आहे आणि आज आम्ही संपूर्ण आर्थिक गुलामगिरीत आलो आहोत हे दिसत आहे.दि 24 जुलै 1991 ला आम्ही संपूर्ण आर्थिक गुलामगिरीच्या धोरणावर शिक्कामोर्तब केले. या दिवशी केंद्रीय उद्योग राज्यमंत्री पी. जे. कुरीयन यांनी नवीन औद्योगिक धोरणांची घोषणा केली त्यामुळे आता भारतात कोणत्याही विदेशी कंपनीला51 टक्के भागभांडवल ठेवता येईल. पूर्वी हा आकडा 40 टक्के इतका होता. त्यामुळे कंपनीचे नियंत्रण भारतीय कंपन्यांच्या हातात राहत होते. आज ते संपूर्ण विदेशी कंपन्यांच्या हातात राहत होते. आज संपूर्ण विदेशी कंपन्यांच्या ताब्यात जाऊ लागले. आज जवळपास भारतातील 76 टक्के बाजारपेठा बहुराष्ट्रीय कंपन्यांच्या हातात आहे. आणि औषधाच्या 75 टक्के व्यापार संपूर्ण यांच्या हातात आहे.यातील 95 टक्के औषधी ह्या गैरजरूरी आहेत म्हणून यावर खर्च होणारा पैसा फालतू आहे. ह्या गैरजरूरी औषधांवरील नफा दरवर्षी 1800 करोड रू. ह्या कंपन्या आपल्या देशात पाठवत असतात. बहुराष्ट्रीय कंपन्यांबाबत एक गोष्ट निश्चित आहे की, ही कंपनी ज्या देशातील असेल तेथील सरकार संपूर्ण त्या कंपनीच्या मागे राहते व त्याकरिता ते कोणत्याही देशावर दवाब आणायला किंवा काही कारवाई करायला मागेपूढे पाहत नाही. अमेरिकेने संपूर्ण लॅटिन अमेरिकन देशांना विळख्यात पकडलेले आहे. तेथील देशात कोणते सरकार असावे याकडे अमेरिकेचे सारखे लक्ष असते. अमेरिकन हितसंबंधाला थोडी जरी बाधा येईल असे

सरकार तेथे दिसले तर एकतर त्या राष्ट्राध्यक्षाचा खून होतो किंवा तेथील सरकार उलथवले जाते. तेथील कलम 162 273 व्यापार विषयक गुप्ततेच्या भंगाबाबत आहे. यामुळे कोणी कंपनीच्या व्यवहाराबाबत कोणाला माहिती दिल्यास आणि माहिती कंपनीच्या गैरव्यवहाराबाबत, लुटीबाबत असली तरी सांगणारी व्यक्ती तेथील कायद्याप्रमाणे राष्ट्रद्रोही हेर ठरते. (यावरून आपल्या लक्षात आले असले की, बोफोर्स तोफांचा भ्रष्टाचार का उघड होवू शकला नाही.)

निर्यात व्यापारातील फसवणूकः

भारत सरकार आपल्या धोरणाच्या समर्थनार्थ विदेशी मुद्रेचे भूत उभे करीत असते आणि ह्या कंपन्यादेखील त्याबाबत बोलत असातात. परंतु सुट्टे भाग, कच्चा माल, यंत्रसामग्री यांच्या आयातीचा विचार केल्यास निर्यातही नगण्य दिसते. तसेच ब-याच कंपन्या आपल्या आखून दिलेल्या उत्पादनाच्या कितीतरी जास्त उत्पन्न काढतात. यांच्या या धोरणाकडे आमचे सरकार डोळेझाक करीत असते.आणि याचा फार मोठा फटका आमच्या येथील देशी कंपन्यांना बसतो. 1977 ला 25 टक्के जास्त विदेशी भागभांडवल असलेल्या

144कंपन्यांच्या निर्यात व्यापाराचा अभ्यास केल्यास दिसते की, ह्या कंपन्या आपल्या शुद्ध विक्रीच्या फक्त 6.52 टक्के निर्यात करीत होत्या आज केवळ 4 टक्के निर्यात करीत आहेत. म्हणजे आपल्या देशातच 96 टक्के माल विक्री होते. ह्या विदेशी कंपन्या निर्यात न करता संपूर्ण बाजारपेठेवरच कब्जा करतात आणि भारतीय कंपन्यांना ऩफ्याच्या दृष्टीने ब-याच मागे सोडतात. 1986-87 मध्ये 301 विदेशी नियंत्रीत कंपन्यांनी आपल्या विक्रीवर पूर्ण नफा 10.2 टक्के कमावला. परंतु त्यांच्या सामान्य खर्च झालेल्या पैश्यांचा हिशोब घेतल्यास हा नफा 40.9 टक्के होता. तर भारतीय 2762 कंपन्यांचा संपूर्ण नफा 7.4 टक्के आणि 12.7 टक्के होता. याचे कारण काय तर भारतीय कंपन्या सक्षम नाहीत असा नाही, तर भारत सरकार विदेशी कंपन्यांना निय़म कायद्याचे खुले उल्लंघन करू देते. त्यामुळे त्यांना जास्त लाभ मिळतो. 1979 ला लक्षात आले होते की, गेस्टलिन विलियम आपल्या लायसेंस क्षमतेच्या 162 टक्के उत्पादन करत होती. तर हिंदुस्तान लिव्हर 132 टक्के साबण बनवित होती. जे.एस. मेरीसन 115 टक्के, तर ब्रिटानिया 870 टक्के. सरकार यांना ही सूट वेगवेगळ्या दबावाखाली. देते. यामुळे भारतीय कंपन्या मागे राहतात किंवा आपले अस्तित्व गमावतात. आताच आताच काही दिवसांपूर्वी टाटाची टॉम्को कंपनी हिंदुस्तान लिव्हरमध्ये विलीन झाली. टाटासारख्या कंपन्यांची ही परिस्थिती होते तर बाकीच्यांची काय? मारुती (सुझुकी) कंपनी बाजारात येण्यापूर्वी भारतीय मोटारींची कमीत कमी एक बाजारपेठ होती. त्यात काही त्रुटी होत्या परंतु ती वाढत होती. आज भारतीय कार उद्योग साफ बुडाला आहे. हीच परिस्थीती मोटरसायकल उद्योगांची आहे. आय. बी. एम, कोकाकोला आणि पेप्सीला कब्जा करण्याकरिता पुन्हा बोलाविले गेले आहे.

विदेशी कंपन्या नेहमी खोटा निर्यात व्यापार करीत असतात. याचे सुंदर उदाहरण जानेवारी 1991 च्या टाईम्स ऑफ इंडियाच्या जाहिरातीतून दिसून येते. ही जाहिरात निर्यात प्रदर्शन तिस-या पार्टीच्या नावावर केल्यास फायद्याबाबत सांगते. जर कोणत्या कंपनीने निर्यात प्रदर्शऩ खरेदी केले तर 5 करोड रूपयांच्या निर्यात मालावर 28 लाख रूपयांची करबचत होते. विदेशी कंपन्यांच्या ह्या प्रकारचा भ्रष्टाचार करायला भारत सरकारने आता आपल्या कंपन्याव्यतिरिक्त दुस-या कंपन्यांचा माल निर्यात करण्याची सूट दिली आहे.पीको (फिलिप्स) सारखी इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी समुद्र खाद्य निर्यात करते. तर हिंदुस्थान लिव्हर खाद्यतेल, तयार कपडे जनावरांची खाद्ये, जोडे वगैरे निर्यात करते. जाहीर आहे की, ह्या वस्तू पूर्वीही निर्यात होत होत्या . बहुराष्ट्रीय कंपन्यांना तर फक्त आपल्या नावावर त्यांना लावायचे आहे. जर अशा प्रकारच्या खोटया निर्यात करणा-या कंपनीला निर्यात सुचीतून वगळले तर प्रत्येक विदेशी कंपनी निर्यात कर्तव्यपूर्ती करीत नाही असे जाहीर करावे लागले.

वेगळा साम्राज्यवाद

दुस-या महायुद्धानंतर साम्राज्यवादी शक्तींना दुस-या देशाला कब्जात ठेवणे संभव दिसले नाही. तेव्हा आर्थिक साम्राज्यवाद पुढे आला व याकरिता आंतरराष्ट्रीय वित्त संस्थांचा सहारा घेतला जाऊ लागला. आज बंदुकीद्वारा नाहीतर विदेशी मुद्रेद्वारा आपली नीती पटवायला ते लावू लागले. बाजारपेठेवर कब्जा करण्याकरिता बहुराष्ट्रीय कंपन्या नेहमी नविन तंत्रज्ञानाच्या शोधात राहतात आणि आधुनिक मशिनरीचा जास्त उपयोग करून आपल्या वस्तू निर्माण करतात याकरिता त्यांना जास्त मानवी श्रमाची आवश्यकता नसते. त्यामुळे त्या आपल्या वस्तू बाजारात काही प्रमाणात काही स्वस्त विकू शकतात. परंतु त्यामुळे उत्पादनाच्या प्रमाणात कमी माणसांनाच रोजगार मिळतो. बेकारांची संख्या वाढते. याचा सरळ परिणाम असा होतो की, लोकांची क्रयशक्ती घटते. एकीकडे काही मूठभर लोकांची श्रीमंती वाढतच जाते. तर दुसरीकडे हलाखीचे जीवन.

स्वतःच्या व्यापाराचा विचार करून अमेरिका, जपान, इंग्लंड, फ्रान्स, आणि इतर विकसित देश त्यांचा व्यापार वाढावा म्हणून नेहमी आपल्या योजना अविकसित देशांच्या गळी उतरवित असतात. अविकसित देशांना त्यांच्या मुद्रेची किंमत नेहमी कमी करण्यास हे लोक भाग पाडीत असतात. यांच्या मदतीला यांच्याच वर्चस्वाखाली असलेल्या जागतिक बॅंक, आंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ह्या संस्था येत असतात.अविकसित देशांना सांगितले जाते. की, अवमूल्यनामुळे जागतिक बाजारपेठेत तुमच्या वस्तू स्वस्त होतील व तुम्ही त्यामुळे योग्य स्पर्धा करू शकाल, तुमच्या वस्तूंची मागणी वाढेल. त्यामुळे तुम्ही जास्त प्रमाणात विदेशी मुद्रा जमा करू शकाल, नेहमी आर्थिक अडचणीत असलेल्या या देशांच्या अडचणीचा फायदा घेऊन ह्या संस्था, हे देश दबावाने त्यांना त्यांच्या मुद्रेचे अवमुल्यन करण्यास भाग पाडतात. यामुळे नेहमी ह्या विकसित देशांचा फायदा होत असतो. त्यांच्या महाग वस्तू या अविकसित देशांत खपतात व यांच्या कर्जाचा डोंगर वाढत जातो. आधी घेतलेल्या कर्जाचा देखील मूल्यांकनामुळे भर पडते तर व्याज देखील वाढते. त्यामुळे हे अविकसित देश नेहमी कर्जाच्या डोंगराखाली दबून राहतात. नाईलाजाने त्यांच्या योजना राबवित असतात. इकडे मुद्रेचे अवमुल्यन करतात त्यांना सांगितले जाते की, जागतिक बाजारपेठेत स्वस्त वस्तूंमुळे तुमच्या मालाची मागणी वाढली तर तुम्हाला जास्त विदेशी मुद्रा मिळविता येतील, तर इकडे डंकेल प्रस्तावासारख्या प्रकाराने त्यांचे हातपाय बांधले जातात. त्यांच्या वस्तू चांगल्या जरी असल्या, त्यांना मागणी जरी जास्त असली तरी आतापर्यंतचा आयात- निर्यात व्यापार पाहून ठराविक कोटयापर्यंतच त्यांना आपला माल विकता येतो. यात त्यांच्या वस्तूची पत कितीही चांगली असो आणि त्यांची वस्तू पुरवठा करण्याची क्षमता कितीही असली तरी त्यांना ठराविक पुरवठयाच्या वर जाता येत नाही.

भारताचा तयार कपडयांचा व्यापार चांगला आहे. यात तो आणखी प्रगती करू शकतो, त्या उद्योगाला वाढविण्यास येथील परिस्थिती अनुकूल आहे. तरीदेखील भारताला आपल्या कोटयाच्या वर निर्यात करा येत नाही.

फक्त चार पाच हजार करोड रूपयांच्या कर्जाकरिता आमच्या सरकारने आंतरराषट्रीय मुद्राकोष व जागतिक बॅंकेच्या दबावापुढे 1991 ला दोन वेळा रूपयाचे अवमूल्यन केले. त्यामुळे आधी घेतलेल्या आमच्या कर्जावर20, 000 करोड रुपयांचा बोजा वाढला तर वित्तमंत्र्यांनी 2000 करोड रूपयांची शेतक-यांची सबसीडी कमी केली. तर अवमुल्यनामुळे खतावर 3000 करोड रूपयांची भाववाढ झाली. यात चार पाच हजार करोड रुपयांकरिता आम्ही 20000 करोड रूपयांचा बोजा वाढवून घेतला. इतर भाववाढ वेगळी. यापेक्षा स्वावलंबनाचे धोरण आखून आपल्या गरजा कमी करून तसेच लोकांना आव्हान केले असते तर इतका पैसा सहज उपलब्ध झाला असता. तसेच देशातील काळा पैसा बाहेर काढला असता तर तो यापेक्षा कितीतरी जास्त निघाला असता परंतु याकरिता गरज आहे स्वबलंबनाने आपण उभे राहू शकतो या विश्वासाची, देशप्रेमाची.

चुकीच्या धोरणामुळे, हलाखीच्या परिस्थीतीमुळे अविकसित देश नेहमी पिंजले जातात. त्यांना नेहमी आपल्या गरजा भागविण्याकरिता कर्ज घेण्यावाचून पर्याय नसतो. त्यांच्या या परिस्थितीचा फायदा घेऊन कर्ज देताना त्यांच्याकडून अनेक सवलती विकसित देश आपल्या पदरी पाडून घेत असतात. त्यांच्यावर अत्यंत जाचक अटी लादतात. दिलेल्या आश्वानाएवढे कर्ज देखील ब-याचदा पूर्ण केले जात नाही. -याचदा ते अडवून धरतात. पैशाचे अवमूल्यन करण्यास भाग पाडतात. यामुळे नेहमी याच विकसित देशाचे वर्चस्व बाजारपेठेसोबत जगावर देखील असते. अर्थात संपूर्ण जगाच्या आर्थिक नाड्या यांनी आपल्या हातात ठेवल्या आहेत, हे यावरून स्पष्ट होते.

(इंग्रजांच्या काळात म. गांधींना मिठाचा सत्याग्रह करावा लागला होता. आता इंग्रंज गेले. पण त्यांचे भाईबंद पुन्हा एकदा भारतावर साम्राज्य निर्माण करण्यासाठी हळूहळू घुसखोरी करत आहेत. आणि गांधींजींच्या नावाची जपमाळ ओढणारे आपले ढोंगी राजकारणी त्यांना देश विकायला निघाले आहेत.

भारतीय जनतेला पुन्हा एकदा मिठाचा सत्याग्रह करण्याची पाळी आली आहे. पण आता शत्रू दोन आहेत. एक देशाबाहेरचे गबर लोक आणि दुसरे आपल्याच देशातले देशद्रोही.)

कांडला सत्याग्रह

केंद्रसरकारने कारगील या अमेरिकन बहुराष्ट्रीय कंपनीला कांडला बंजरातील 15000 एकर जागा मीठ उद्योगाकरिता देऊ केली आहे. याविरूद्ध दि. 19 मे पासून कांडला बंदरात सत्याग्रह सुरू झाला आहे. आता तर 60000 एकर जमीन देण्याचे ठरले आहे. असे दि. 7 जूनला श्री. जॉर्ज फर्नांडिस यांनी आपल्या मुंबईतील वार्ता परिषदेत सांगितले.

कारगिल कंपनीने 10 लाख टन मीठ उद्योगाकरिता केंद्र सरकारला कांडला बंदरातील 15000 एकर जागा मिगितली आणि आमच्या सरकारने फारच तत्परतेने त्यांना जागा उपलब्ध करून देण्याचे ठरविले व तसे त्या कंपनीला कळविले. कारगिल कंपनीला जी जागा पाहिजे ती जा आमच्या सुरक्षिततेच्या दृष्टीने कोणत्याही विदेशी कंपनीला देणे योग्य नाही असे सुरक्षा विभागाचे मत आहे. ही जागा पोर्ट ट्रस्टच्या मालकीची आहे. पोर्ट ट्रस्टने या विरूद्ध आपल्या मिटिंगमध्ये जमीन न देण्याबाबतच ठराव देखील केला. परंतु केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालयाने पोर्ट ट्रस्टच्या अध्यक्षाला कळविले व आदेश दिला की, भारत सरकारने कारगील कंपनीला जागा देण्याचे ठरविले आहे आपल्याला फक्त औपचारिकता पूर्ण करावयाची आहे. त्यांना दुसरी मिटिंग बोलावून ठराव पास करून घ्यायला सांगितले. या दुस-या मिटिंगमधे देखील पोर्ट ट्रस्टच्या बहुसंख्य सदस्यांनी याला विरोध केला. तेव्हा भूतल परिवहन मंत्रालयाचे संयुक्त सचिव श्री. अशोक जोशी यांनी त्यांना धमकी दिली. पोर्ट ट्रस्ट ताब्यात घेण्याबाबत बोलले व ठराव पास करून घेतला. तरी देखील पोर्ट ट्रस्टचे सदस्य यात एक अट घालण्यास यशस्वी ठरले. जोपर्यंत सुरक्षा विभाग संमती देत नाही. आणि बंदराच्या भवितव्याबाबत निर्णय होत नाही. तोपर्यंत कारगील कंपनीला जमीन देऊ नये. कारगील इनकॉर्पोरिटेड ही अमेरिकेची

महाकाय बहुराष्ट्रीय कंपनी आहे.या कंपनीसोबत आणखी 800 कंपन्या जोडल्या आहेत. जगात जवळपास 50- 60 देशांत या कंपनीचा व्यापार उद्योग चालतो. मागील 91-92 या वर्षी या कंपनीने 60 अब्ज डॉलर्सचे उत्पादन केले होते. म्हणजे जवळपास 1, 80,000 करोड रूपयांचे. हा पैसा भारताच्या संपूर्ण राष्ट्रीय उत्पादनाच्या 1/3 इतका आहे. आयात- निर्यात व्यपाराकरिता या कंपनीजवळ स्वतःच्या मालकीच्या 100 बोटी आहेत. ही कंपनी कृषी, पोलाद, खते, प्लॅस्टिक अशा अनेक मोठया उद्योगात आहे. तर अमेरिकेच्या संपूर्ण गव्हाच्या बाजारपेठेवर या कंपनींची मक्तेदारी आहे. तर काही वस्तूंचे पेटंट देखील या कंपनीने खरेदी केलेले आहेत. ही कंपनी खरं म्हणजे वहातूक व्यवसायामधील अग्रणी आहे.

तिला मीठ तयार करण्याच्या निमित्ताने भारतीय समुद्रकिना-यावर ठाण मांडून बसायचे आहे. कांडला बंदरात मोठी भिंत बांधण्याचा अवाढव्य खर्च करायची तिची तयारी आहे. सागरी वहातूकीवर काबू मिळविणे हे खरे उद्दीष्ट आहे.

कांडला बंदराच्या विश्वस्तांनी 1973 पूर्वी 16500 एकर जमीन स्थानिक लोकांनी मिठागरे बनविण्याकरिता दिली होती. तेव्हा मिठागरे बनविण्याकरिता दिली होती. तेव्हा मिठागरे बनविताना त्या भागातील लहान लहान झुडुपे उत्पादकांची कापून काढली. याचा परिणाम असा झाला की, हवेमुळे तेथील माती व रेती रेती बंदरात साचायला लागली. त्यामुळे बंदराची खोली कमी कमी होत गेली. याकरिता दरवर्षी कांडला पोर्ट ट्रस्टला बंदरातील गाळ काढायला 15 ते 20 करोड रू. खर्च येतो. त्यामुळे 1973 ला पोर्ट ट्रस्टने असा निर्णय घेतला होता की, यापुढे मिठागरे निर्माण करण्याकरिता जमीन द्याची नाही. म्हणून गेल्या 20 वर्षांपासून स्थानिक इच्छुकांना मीठ उद्योगाला जमीन देण्यात आली नाही. तसेच पर्यावरणाचा विचार करून केंद्र सरकारच्या वैज्ञानिक संस्था अहमदाबादचे स्पेस अप्लिकेशन सेंटर, खडकवासल्याची केंद्रीय जल संशोधन संस्था या संस्थांनी मिठागरे बनविण्याकरिता परवानगी देऊ नये असे आग्रही मत दिले होते. कांडला पोर्ट ट्रस्टने 9 डिसेंबर 1992च्या आपल्या मिटिंमध्ये कारगील कंपनीला जमीन न देण्याबाबत 25 महत्वपूर्ण कारणे दिली होती. यात कच्छचा किनारा पाकिस्तान सीमारेषेजवळ येत असल्यामुळे सुरक्षेच्या दृष्टीने विदेशी लोकांना तेथे कायमचे वास्तव्य देणे धोक्याचे आहे. तसेच कांडला बंदराच्या विकासाबाबत ट्रस्टने 2005 पर्यंतचा आराखडा तयार केला आहे.

मिठागरे बनविण्यास बंदरात रेती व मीठ साचून त्याची खोली कमी होत जाईल, त्यामुळे बंदर बंद होण्याचा धोका, तसेच पर्यावरणाला धोका आहे. 1973 पूर्वी 16500 एकर जागा ट्रस्टने अनेक मीठ उद्योजकाला वाटून दिली. आता एकाच कंपनीला 15000 एकर जागा देणे म्हणजे स्थानिक इच्छुक मीठ उद्योजकांवर अन्याय करण्यासारखे होईल. तर

कांडला पोर्ट ट्रस्टची जबाबदारी बंदराचा विकास करून जलवाहतुकीने आयात- निर्यात व्यापार वाढविण्याची आहे. मीठ उद्योजकाला प्रोत्साहन देण्याचा नाही. कारगील कंपनी स्थानिक उद्योगाप्रमाणे मीठ निर्माण करणार तेव्हा आधुनिकतेचा प्रश्न नाही. कारगील कंपनीला 10 लाख टन मीठ उद्योगाला परवानगी देणे आमच्या दृष्टीने खरंच आवश्यक आहे का ? 1991-1992 ला आमचे मीठ उत्पादन 1 करोड 40 लाख टन झाले होते. आमची गरज 1 करोड टनाची आहे. आम्ही पाच लाख टन मीठ निर्यात केले. 35 लाख टन मीठ वाया गेले. आमच्या आमच्या मीठाचे उत्पादन पाहिले असता आम्ही या उद्योगात मागे नाही. तर बरेच पुढे आहोत. जेव्हा आमचे 35 लाख टन मीठ वाया जाते , त्यावेळेस दुस-या देशाच्या 10 लाख टन मीठ उत्पादनाकरिता जागा उपलब्ध करून देणे कितपत योग्य आहे? तसेच 10 लाख टन मीठ निर्यातीकरिता त्या कंपनीला हा उद्योग लावायचा आहे तर या उद्योगात आम्ही लक्ष का घालू नये? परंतु या बाब आमचे सरकार लक्ष का घालू नये? परंतु याबाबत आमचे सरकार लक्ष घालायला बिलकूल तयार दिसत नाही. देशी उद्योग वाढण्यास लक्ष घालण्याकरिता आमच्या सरकारला स्वारस्य तरी आहे काय ? मीठ उद्योग हा मध्यम व लघुउद्योग आहे. या उद्योगात 2 लाख लोक गुंतलेले आहेत. म्हणजे दोन लाख कुंटुंबाचे जीवन या उद्योगावर अबलंबून आहे. कारगील कंपनीचा असाच 20 लाख टन निर्मितीचा मीठ उद्योग ऑस्ट्रेलियात आहे. तेथे फक्त 50 लोक काम पाहतात. आमच्या संपूर्ण 1 करोड 40 लाख टन निर्मितीकरिता फक्त 350 लोकांत याचे काम पूर्ण होऊ शकते. यावरून ही कंपनी आमच्या येथे आली, तिच्या विळख्यात जर आमचा हा मीठ उद्योग गेला तर किती लोकांवर बेकारीची पाळी येऊ शकते. याची कल्पना आपण करू शकता. कारगील कंपनीला जमीन देण्याबाबत आमच्या सरकारचे ज्याप्रामाणे उतावळे धोरण दिसत आहे त्यात अमेरिकेचा दबाव आहे की 48 करोडच्या या योजनेत काही व्यक्तिगत स्वार्थ लपलेला आहे ?

भारताचा समुद्र किनारा गुजरातपासून केरळपर्यंत तर इकडे तामिळनाडूपासून बंगालपर्यंत पसरलेला आहे. परंतु कारगील कंपनीने कांडला बंदराजवळील जमीनच मीठ उद्योगाकरिता का मागितली याला काही कारणे आहेत. कारगील या उद्योगाबाबत ज्याप्रकारे धडपड करीत आहे, त्याच्या तपशीलास गेल्यास कारीलला काही हजार हेक्टर जमीनीपेक्षा इथला संपूर्ण मीठ उद्योगच मिळण्याची अभिलाषा आहे. कारगीलने 1992 ला या उद्योगांबाबत जमिनीची मागणी केली तरी या आधीपासूनच आपल्या येथील सरकारात बसलेल्या देशद्रोह्यांनी हे षडंयंत्र चालविलेले आहे. आतापर्यंत समुद्र किना-यावर कुटिर उद्योगाद्वारे बनवले जाणारे मीठ अशुद्ध ठरविण्यात आलेले आहे. 1995 पर्यंत आधुनिक तंत्रज्ञानाने बनवलेले मीठच शुद्ध व खाण्यायोग्य मानले जाईल. केंद्रीय उद्योग मंत्रालयाच्या मीठ सल्लागार समितीने 8 जून 1989 ला एक आदेश काढला. त्यामुळे मिठाच्या शुद्धतेचा मापदंड बदलला गेला आहे.

8 जून 1989 पर्यंत 94 टक्के सोडियम क्लोराइडयुक्त मीठच शुद्ध मानले जात होते. परंतु नव्या आदेशाप्रमाणे 98 टक्के सोडियम क्लोराइडयुक्त मीठच शुद्ध मानले जाईल. सरकारी परिपत्रकाप्रमाणे केंद्रीय मीठ सल्लागार बोर्डाच्या सल्यावरून केंद्र सरकारने हा निर्णय घेतलेला आहे. 1 एप्रिल 1992 पासून दरवर्षी मिठाची शुद्धता वाढवून 1995 पर्यंत 98 टक्के करण्याची आहे. याचाच अर्थ असा की, 1995 पासून 98 टक्के सोडियम क्लोराइड असलेले मीठच बाजारात विकता येईल. 1 एप्रिल 1992 ला मीठ शुद्ध करण्याच्या कार्यक्रमाला सुरवात झाली व 2 जुलै 1992 ला कारगीलने विदेश निवेश बोर्डाशी संपर्क केला. ( हे बोर्ड प्रधानमंत्री कार्यालयाचा हिस्सा आहे.) निव्वळ योगायोग नाही. कारण

भारताचा इतका मोठा समुद्रकिनारा असतानादेखील कारगीलला गुजराततीच जमीन पाहिजे. कारण संपूर्ण भारतात गुजरातच्या या किना-यावर मिळणारे मीठ मुळातच 97-98 टक्के सोडियम क्लोराइडयुक्त आहे. बाकीच्या किना-यावर इतकी शुद्धता सापडत नाही. यावरून असे दिसते की या कंपनीचे कोणी ना कोणी हितसंबंधी आमच्या उद्योग मंत्रालयात असतील. नाहीतर या कंपनीला आमच्या येथील तपशीलाची माहिती कशी ? हा निव्वळ योगायोग नाही. येथे बरेच जयचंद बसलेले आहेत. ही त्याची पावती आहे. माजी प्रधानमंत्री यांनी अर्थखात्याच्या काही अधिका-यांवर संसदेत आरोप केला होता की, त्यांच्या कारकीर्दीत आलेली जागतिक बँकेची काही कागदपत्रे त्या अधिका-यांनी त्यांच्यापासून लपवून ठेवली होती व ती त्यानंतर आलेल्या आताच्या सरकारच्या हवाली केली. हे अधिकारी एकादातरी जागतिक बँकेचा दौरा करून आलेले होते. आतापर्यंत त्यांनी हा आरोप मागे घेतलेला नाही. एक माजी प्रधानमंत्री संसदेत इतका गंभीर आरोप करीत असताना देखील त्यांच्या आरोपाची दखल घेतली जात नाही. यावरून या देशाचा कारभार किती रसतळाला गेलेला आहे हे स्पष्ट होते.



सावधानतेचा इशाराः

केंद्र सरकारच्या सत्वहीन धोरणामुळे किंवा देशाच्या सुरक्षेच्या दृष्टीने दूरदृष्टीच्या अभावामूळे कोणाच्याही दबावाखाली कोणत्याही बहुराष्ट्रीय कंपन्यांना मुक्त प्रवेश द्याचे धोरण असेच चालले तर ह्या कंपन्य आपल्या विळख्यात संपूर्ण देशाला जखडून टाकतील. तेव्हा जो कोणी यांचे कारनामे उघड करण्याचा प्रयत्न करील त्याच्या जीविताची गॅरंटी नसेल. केंद्र आणि राज्य सरकारे यांच्याच तालावर नाचतील. देशात दरवेळेस अराजक परिस्थिती राहील. निव्वळ नेत्यांच्या सुरक्षिततेचा खर्च वाढत जाईल आणि एकवेळी फिलिपाईन्स, दक्षिण कोरियासारखी परिस्थिती निर्माण होईल.

देश स्वतंत्र असूनही गुलामीचे जीवन जगण्याची पाळी जनतेवर येईल. याला संपूर्ण रोखण्याची ताकद आपल्यात आहे. आपल्या काही सवयींना मुरड घालून आणि आपल्या आवश्यक गरजा भागविणा-या आणि इतर वस्तू ह्या आतापासूनच जर आपण देशी कंपन्याच्या वापरायला सुरवात केली आणि बहुराष्ट्रीय कंपन्यांच्या संपूर्ण मालावर बहिष्कार टाकला तर परदेशी कंपन्यांना यांना मुकाट्याने आपला गाशा गुंडाळावा लागेल. मग आमच्या येथील कितीही मोठ्या व्यक्तींचे हितसंबंध गुंतलेले का असेनात.

बहुराष्ट्रीय कंपन्या आपला माल आपल्या माथी मारण्याकरिता करोडो रूपये जाहिरातींवर खर्च करतात. देशी कंपन्या यांच्या जाहिरात- विश्वात टिकाव धरू शकत नाहीत.जाहिरातींमुळे ह्या कंपन्या नेहमी आपल्या डोक्यात राहतात व आपण दुकानातून अनपेक्षित याच कंपन्यांच्या वस्तू खरेदी करीत असतो. तेव्हा आपल्याला माहीत नसते, आपण आपला स्वदेशी उद्योग बुडवित आहोत आणि चोरांचे खिसे भरत आहोत. तर दरवेळेस वस्तुवरील माहीती वाचून आणि खात्री करून घ्यावी की ही स्वदेशीय कंपनीची वस्तू आहे तरच खरेदी करावी. यामुळे आपण आपल्या देशाच्या उन्नतीलाच हातभार लावाल. आपला पैसा विदेशात जाणार नाही. इथल्या माणसांना नवीन रोजगार मिळण्याची संधी वाढेल.

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

*मंत्रात शक्ती असते कां ???*

 🔆      *मंत्रात शक्ती असते कां ???*      🔆

   

बऱ्याच जणांना हा प्रश्न पडतो खरच मंत्रात शक्ती आहे कां ??? 

  

याचं हे साधं उदाहरण... कुणीतरी आपल्याला आपल्या समोर बसून शिव्या घालतो, नको नको ते बोलतो. तेंव्हा आपल्यावर परिणाम होतो ???

होय, होतो. काय होतो ??? 


तर, आपल्याला राग येतो. चिड येते. म्हणजेच काय तर समोरच्याने वापरलेल्या शब्दांमुळे आपल्यात निगेटीव्ह एनर्जी तयार होते. त्याचे परिणाम म्हणून राग आणि चिडचिड बाहेर पडते. म्हणजे त्या शिव्यांमध्ये ताकद आहे.


तसंच... आपल्यासमोर आपली खूप स्तुती केली, आपल्याला खूप चांगले बोलल्या गेले तर काय होईल ???


आपण प्रसन्न होतो, आनंद वाटतो. एकुणच काय तर आपण पाॕझिटीव्ह होतो. पाॕझिटीव्ह उर्जा त्या गोड शब्दांनी वाढते. म्हणजे गोड शब्दात पण ताकद आहे. 


तसंच अगदी तसंच या मंत्रातील शब्दात देखील एक ऊर्जा असते. आणि हे मंत्र खूप आधी ऋषी मुनींनी संशोधनातून तयार केलेत.आपण त्यांना जरी ऋषी म्हणत असलो तरी, ते तेंव्हाचे संशोधक होते, असे म्हणायला हरकत नाही.


*" श्री राम जय राम जय जय राम..."* असे जरी आपण शांतपणे उच्चारले तरी डोक्यात स्पंदन, लहरी निर्माण होतात किंवा विशिष्ट व्हायब्रेशन जाणवतात. म्हणजेच आपल्या शरिरातील विशिष्ट ठिकाणी व्हायब्रेशन होऊन लहरी उत्पन्न होतात. आणि निश्चितच त्यातून एक पाॕझिटीव्ह एनर्जी उत्पन्न होते.


ही जादू वगैरे नाही तर आपलीच एनर्जी असते. फक्त ती चार्ज करायची असते. 


बस एवढं साधं सरळ सोपं आहे की शब्दात, मंत्रात ताकद असतेच...


*"श्री राम समर्थ..."* 🙏🏻🙏🏻🙏🏻

सोमवार, 25 जनवरी 2021