सोमवार, 30 अगस्त 2021

राष्ट्रिय सौर दिनदर्शिकाका समुचित प्रचार करवानेमें सहयोग हेतु खासदारोंको प्रस्तावित पत्र

 

मा. खासदार,

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विषय :- राष्ट्रिय सौर दिनदर्शिकाका समुचित प्रचार करवानेमें सहयोग हेतु

महोदय,

स्वतंत्रताके पश्चात तत्कालीन लोकसभाके सदस्योंके विचार मंथनमें यह निर्धारित हुआ कि स्वतंत्र भारतवर्षकी एक अपनी राष्ट्रिय कालगणना पद्धति होनी चाहिये इस कार्यके लिये मान्यवर वैज्ञानिक श्री मेघनाद साहाकी अध्यक्षतामे एक समितीका गठन किया गया।

समितीकी अनुशंसाओंके परिप्रेक्ष्यमे सौरचक्रपर आधारित राष्ट्रिय कालगणनाको संसद द्वारा स्वीकृत किया गया। स्वीकृती की जानकरी “सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय” द्वारा 1957 को प्रेषित की गई यह स्वीकृत दिनदर्शिका 1 चैत्र 1879 (22-03-1957) से लागू कर दी गई

राष्ट्रिय दिनदर्शिकाको राष्ट्रिय प्रतिकोंमे सम्मिलित किया गया। दैनंदिन व्यवहारमे इस दिनदर्शिकाका प्रचलन होने हेतु तत्कालीन गृहमंत्रालयद्वारा एक परिपत्र (F/42/16/57 PUB I, Dt. 11-12-57) भी राज्य सरकारोंको तथा केंद्रशासित प्रदेशोंको प्रेषित किया गया। इस परिपत्रमे यह स्पष्ट रूपसे उल्लेखित है कि, सभी राज्य तथा केंद्रशासित प्रदेशोंमे, इस दिनदर्शिकाके विषयमे जन जागृती राई जाये तथा इसका दैनंदिन व्यवहारमे प्रयोग कराने हेतु आवश्यक कार्यवाही की जाये

राष्ट्रिय दिनदर्शिकाका उपयोग अधिकतम मात्रामे विदेश मंत्रालयद्वारा किया जाता है। सभी अंतरराष्ट्रीय समझौतोंमे ग्रेगोरियन दिनांकके साथ राष्ट्रिय दिनांक लिखना अनिवार्य है। परन्तु दुर्भाग्यवश राष्ट्रिय दिनदर्शिकाका चलन अभीतक जनमानस के बीच नही पहुँचा है।

राष्ट्रिय दिनदर्शिका प्रसार तथा प्रचार करने हेतु वर्ष ------------------- में औरंगाबाद (महाराष्ट्र) शहरमे राष्ट्रिय दिनदर्शिका प्रसार मंचकी स्थापना की संस्थाके सदस्य भारतभरमे, विशेषतः महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, . बंगाल, आसाम, दिल्लीमे कार्यरत है। सभी राज्योंके सदस्योंसे विचारमंथन करते हुए यह बात स्पष्टतासे सामने आयी कि राष्ट्रीय दिनदर्शिकाकी स्वीकार्यतामें कठिनाइयाँ क्यों हैं। इस कारणकी चर्चा यहाँ प्रस्तुत है।

कृषिके लिए सौर ऋतुचक्रका विशेष महत्व है, इसी लिये हमारे पर्व, सप्ताहके वार के आधारपर मनाये जाते हैं इसी प्रकार पंजाब, तमिळनाडू और आसाम जैसे राज्योंमे सूर्यके राशी-संक्रमणानुसार वार्षिक कालगणना होती है। वैदिक कालखण्डमें भी सूर्य और उससे उत्पन्न ऋतुचक्रोंका महत्व ध्यानमें रखकर ऋतुओंके आधारसे बारह महीनोंके हेतु मधु-माधव-शुचि-शुक्र इस प्रकार बारह नाम प्रचलनमें थे। साथही चंद्रमाको देखकर तिथी-निर्धारण अत्यंत सुलभ होनेके कारण चांद्रपंचांगका भी महत्व है। तो चांद्रपंचांगमें नक्षत्रोंके आधारसे मासोंके नाम चैत्र-वैशाख-ज्येष्ठ आदि नियत हुए थे। कालान्तरमें चांद्रतिथीकी सुलभताके कारण ऋतु-आधारित नाम, जो वास्तवमें कृषिसंबंधी मार्गदर्शन करते हैं वे पीछे पडकर विस्मृत हो गये। प्रायः सभी धार्मिक विधियाँ चांद्र-तिथियोंसे निश्चित होने लगीं अतः चांद्रमासी तिथियाँ जनमानसमें आधारभूत हो गईं।

राष्ट्रिय दिनदर्शिका प्रसार मंचने पाया कि राष्ट्रिय सौर कॅलेण्डरमें सुझाये महीनोंकी तिथियाँ तो सौरचक्रसे चलती हैं परन्तु महीनोंके नाम वही तय किये जो धार्मिक माहके नाम हैं (चैत्र, वैशाख ..... इत्यादि) इस प्रकार सौर धार्मिक माह एक ही होते हुए भी तिथियाँ भिन्न होनेकी वजहसे राष्ट्रिय दिनदर्शिका तथा धार्मिक दिनदर्शिकाओंके बीच संभ्रमकी स्थिति बनती है। राष्ट्रिय कॅलेण्डरमें चैत्र पढनेपर लगता है कि यह चैत्र नवमी है, परन्तु वास्तवमें उस दिन कोई अन्य तिथी होती है।

इसी संभ्रमके कारण यह दिनदर्शिका भारतवर्षके दैनंदिन व्यवहारमे प्रचलित नही हो सकी, और हो सकेगी केव सरकारी परिपत्रकोंमें इसे दुय्यम स्थान प्राप्त है।

यदि हमे हमारी राष्ट्रिय दिनदर्शिकाको उचित स्थान देना है तथा दैनंदिन व्यवहारमे प्राथमिक रूपसे प्रचलित करना है तो उसका सरल सा उपाय है कि राष्ट्रिय दिनदर्शिकामें माहोंके नाम वैदिक परंपरानुसार मधु, माधव, शुक्र, शुचि..... इत्यादि रखना उचित होगा। ऐसा करनेपर राष्ट्रिय कालगणना तथा धार्मिक कालगणनामे जो संभ्रम है वह दूर हो जाएगा। इसके लिये मात्र एक छोटासा अमेंण्डमेंट बिल संसदमें पारित करनेकी आवश्यकता है। साथ हम यह भी सुझाव राखना चाहते है कि भी राष्ट्रिय दिनदर्शिकामे शक वर्ष गिना जाता है उसे बदलकर युगाब्द गिनना आरंभ जाये, जो भारतीय संस्कृतिकी प्राचीनतम ज्ञात कालगणना है।

राष्ट्रिय दिनदर्शिका मंचका प्रसार प्रचारका कार्य निरंतर प्रगतिपथ पर है। इस राष्ट्रिय कार्यमें आपके योगदानसे यह कार्य शीघ्रगतीसे आपना ध्येय प्राप्त करेगा। आप सभीके योगदानसे राष्ट्रिय दिनदर्शिका विश्वमे अग्रेसर स्थान प्राप्त करेगी

इस विषयमे आपको अधिक जानकारी देने हेतु हमे आपका 30 मिनटका समय चाहिये। हमे आशा है, आप इस कार्यके लिए पना समय देंगे

आपसे सहयोगकी अपेक्षामे

धन्यवादपूर्वक,

(.............., अध्यक्ष, राष्ट्रिय दिनदर्शिका प्रचार मंच, औरंगाबाद, महाराष्ट्र)


गुरुवार, 22 जुलाई 2021

 Do you know that the Constitution of India was written by hand ?No instrument was used to write the whole constitution. 


Prem Bihari Narayan Rayzada, a resident of Delhi, wrote this huge book, the entire constitution, in italic style with his own hands.


Prem Bihari was a famous calligrapher  of that time. He was born on 16th December,1901 in the family of a renowned handwriting researcher in Delhi. He lost his parents at a young age. His grandfather was Ram Prasad Saxena & uncle Chatur Bihari Narayan Saxena. His grandfather Ram Prasad was a calligrapher. He was a scholar of Persian & English. He taught Persian to high-ranking officials of the English government.


He  used to teach calligraphy to Prem Bihari from an early age for writing in a beautiful style.  After graduating from St. Stephen's College, Delhi, Prem Bihari started practicing the art of  calligraphy  learned from his grandfather. Gradually his name began to spread everywhere because of his beautiful handwriting. When the Constitution was ready for printing, the then Prime Minister of India, Jawaharlal Nehru summoned Prem Bihari. Nehru wanted to have the Constitution in handwritten calligraphy in italic letters instead of in print. 


That is why he called Prem Bihari. After Prem Bihari arrived, Nehruji asked him to write the Constitution in italic style & asked him what fee he would take.


Prem Bihari told Nehruji, “Not a single penny. By the grace of God I have all the things & I am quite happy with my life." After saying this, he made a request to Nehruji "I have one reservation - that on every page of Constitution I will write my name & on the last page I will write my name along with my grandfather's name." Nehruji accepted his request. He was given a house to write this Constitution. Sitting there, Premji wrote the manuscript of the entire Constitution.


Before starting writing, Prem Bihari Narayan came to Santiniketan on 29th November, 1949 with the then President of India, Shri Rajendra Prasad, at the behest of Nehruji. They discussed with the famous painter Nandalal Basu & decided how & which part of the leaf Prem Bihari would write on, & the part to be left blank for Nandalal Basu; who would decorate the rest of the blank part of the leaf.


Nandalal Bose & some of his students from Santiniketan filled these gaps with impeccable imagery. Mohenjo-daro seals, Ramayana, Mahabharata, Life of Gautam Buddha, Promotion of Buddhism by Emperor Ashoka, Meeting of Vikramaditya, Emperor Akbar & Mughal Empire, Empress Lakshmibai, Tipu Sultan, Gandhiji's Movement, Netaji Subhas Chandra Bose & Rupachitra is all reflected in their drawings.


All in all, it is a pictorial representation of the history & geography of India. They painted the pictures very thoughtfully according to the content & paragraphs of the constitution.


Prem Bihari needed 432 pen holders to write the Indian Constitution & he used nib number 303b. The nibs were brought from England & Czechoslovakia. He wrote the manuscript of the entire Constitution for six long months in a room in the Constitution Hall of India. 


Prem Bihari died on 17th February, 1986. The original book of the Indian Constitution is now preserved in the library of the Parliament House, Delhi. Later, a few books were published in print under the supervision of the Survey of India in Dehradun.


Within a vault-like room in the Library of the Parliament of India in New Delhi sit helium-filled cases - 30x21x9 inches. The temperature is fixed at 20°C (+/- 2°C) & a 30% (+/- 5%) relative humidity is maintained throughout the year. Within the nitrogen-laden case lies the 251-page bound manuscript. These pages are of  parchment. The Constitution is 22 inches long &16 inches wide. It's weight is 3 Kg. 650 gms. & its title is Constitution of India. It is the original manuscript of the Constitution of India that came into force on 26th January, 1950.


Political pundits count the 22 parts, 395 articles & 8 schedules of the original Constitution. But what catches the eye is its aesthetics. Beautiful borders on each parchment paper & words slanting artistically. The curl at the crown of the Bs & Rs, the neat loop at the beginning of U, perfectly coiled quotation marks & the perfect parentheses. Not one word misplaced, not one blotch of ink anywhere. The italics & the numbers so immaculately penned that it is difficult to surmise that it was written by man. A man named Prem Behari Narain Raizada (Saxena).


The Constitution of India is the longest hand written Constitution of any country in the world.


Hope it will update you.

*संजीवन समाधी

 *संजीवन समाधी घेतल्या नंतर शरीराचे काय होते?*

ह्याचे उत्तर म्हणून माझ्या वाचनात आलेली माहिती देत आहे.

*संजीवन समाधी*


नाथ संप्रदायातील खऱ्या साधकांच्या ध्येयाची किंवा तपश्चर्येची शेवटची इच्छा म्हणजे समाधी अवस्था.पण *जिवंत समाधी आणि संजीवन समाधी यातील फरक सदरील लेखात आहे.*


सद्गुरु भगवान श्री ज्ञानेश्वर महाराज हे अद्वितीय अवतार आहेत. त्यांच्या सा-याच गोष्टी अत्यंत अलौकिक आहेत.जसा त्यांचा जन्म अलौकिक तशीच त्यांची संजीवन समाधी देखील एकमेवाद्वितीय आहे. *आजवर जगात केवळ भगवान सद्गुरु श्री ज्ञानेश्वर महाराजांनीच ही विशिष्ट अशी "संजीवन समाधी" घेतलेली आहे.*


सामान्यत: लोक जिवंत समाधी व संजीवन समाधी यात गल्लत करतात.त्यामुळे कोणा महात्म्यांनी जिवंत समाधी घेतलेली असेल तर त्याला लोक संजीवन समाधीच म्हणतात. वस्तुत: संजीवन समाधी ही जिवंत समाधी पेक्षा खूपच वेगळी आहे. *जिवंत समाधी घेतलेल्या महात्म्यांचाही कालांतराने नैसर्गिक मृत्यू होऊनच देहपात होत असतो.* परंतु या *संजीवन समाधीमध्ये मृत्यूच होत नाही, देहत्याग घडतच नसतो.* या संजीवन समाधीची प्रक्रिया अत्यंत जटिल व विलक्षण आहे. नाथसंप्रदायातील अनेक महात्म्यांना ही प्रक्रिया सद्गुरुकृपेने ज्ञात असली तरी, *श्रीभगवंतांच्याच आज्ञेने श्री ज्ञानेश्वर महाराजांनीच त्या प्रक्रियेचा अवलंब करून तशी संजीवन समाधी घेतलेली आहे.* सर्व महात्म्यांनी मिळून तो केवळ श्री माउलींसाठीच एकमताने राखीव ठेवलेला विशेष अधिकार आहे,असे म्हणा हवे तर.


संजीवन समाधीच्या प्रक्रियेचा सूचक संकेत श्रीसंत नामदेव महाराजांनी माउलींच्या समाधिवर्णनाच्या आपल्या अभंगांत केलेला आहे.श्री नामदेवरायांच्या गाथ्यात "श्रीज्ञानदेव समाधिमहिमा" नावाचे आणखी एक स्वतंत्र प्रकरण आहे.यात प्रत्यक्ष भगवान श्रीपंढरीनाथच,संतांच्या प्रेमळ विनंतीवरून श्री माउलींचे व त्यांच्या समाधीचे माहात्म्य कथन करीत आहेत.या प्रकरणातही काही विशेष संदर्भ मिळतात.त्यात श्री सोपान देवांच्या समाधीचा उल्लेख करताना श्रीपांडुरंग म्हणतात की, "त्यावेळी हा ज्ञानदेवही दिव्यदेहाने आमच्यासारखाच सासवडला येईल तुझ्या समाधीसाठी." माउलींच्या संजीवन समाधीत त्यांचा देहत्याग घडलेला नाही, हेच देवही येथे सूचित करीत आहेत.


*सद्गुरु श्री माउलींच्या संजीवन समाधीबद्दलची विशेष ......*


सद्गुरू श्री माउलींनी श्रीभगवंतांना समाधीची परवानगी मागितल्यावर, देवांनीच त्यांना आळंदीच्या त्यांच्या स्थानाची माहिती दिली. म्हणजे माउलींना ते माहीत नव्हते असे नाही,पद्धत म्हणून त्यांनी देवांना त्याबद्दल विचारले. *आळंदीच्या सिध्देश्वर मंदिराच्या समोरील नंदीखाली असणारे समाधिविवर हेच माउलींचे अनादिस्थान आहे. तेथेच त्यांनी या पूर्वी एकशे आठ वेळा समाधी घेतलेली असून ही त्यांची एकशेनववी वेळ होती समाधी घेण्याची,असे नामदेवराय सांगतात.* तेथूनच ते पुन्हा पुन्हा दरवेळी अवतार घेऊन येत असतात.देवांच्या सांगण्यानुसार नंदी हलवल्यावर खालचे विवर मोकळे झाले.नामदेवरायांच्या चारही पुत्रांनी ते स्वच्छ करून त्यातील चौथ-यावर मृगाजिन वगैरे घालून समाधीची सर्व सिद्धता केली.


आदल्या दिवशी,कार्तिक कृष्ण द्वादशीला प्रत्यक्ष श्रीभगवंतांनी स्वहस्ते दिव्य अन्न तयार करून माउलींना स्वत: भोजन वाढले . त्या अमृतमय अन्नामुळे माउलींच्या आत शरीरभर अमृतच तयार झाले.


*कार्तिक कृष्ण त्रयोदशीला सकाळच्या वेळी माउलींची पूजा झाल्यावर,एकीकडून श्री निवृत्तिनाथ व एकीकडून श्रीभगवंतांनी हाताला धरून माउलींना त्या समाधि विवराच्या आत नेले.तेथील आसनावर बसून माउलींनी डोळे मिटून तीन वेळा नमस्कार केला,भीममुद्रा लावली आणि ते 'संजीवन समाधीत गेले.* त्यानंतर श्रीपांडुरंग व श्री निवृत्तिनाथ बाहेर आले.


*संजीवन समाधी साधण्यासाठी तत्त्वांचा तत्त्वांमध्ये नाथ संप्रदायोक्त पद्धतीने लय केला जातो.* सद्गुरु श्री माउलींनी समाधी विवरात बसल्यानंतर याच पद्धतीने तत्त्वांचा लय करायला सुरुवात केल्यावर, ती प्रक्रिया उपस्थित सर्व संतांना डोळ्यांनी प्रत्यक्ष पाहता आली. पृथ्वीतत्त्वाचा जलतत्त्वात, जलाचा अग्नीत,अग्नीचा वायूत व वायूचा आकाशतत्त्वात लय झाला.आकाशाचा लय कशातच होत नसल्याने ते भगवती शक्तीच्या आकाशाशी, चिदाकाशाशी तदाकार होऊन राहते. ही प्रक्रिया माउलींच्या देहावर घडताना उपस्थित संतांना प्रत्यक्ष पाहता आली. *पृथ्वी व जलतत्त्वाचा लय झाल्यावर माउलींच्या स्थूल शरीराचा भाग अदृश्य झाला आणि त्याजागी तेजोमय मूर्ती दिसू लागली.* तेजतत्त्वही लय पावल्यावर समोरची ती तेजाकृती देखील दिसेनाशी झाली व केवळ नादरूपाने प्रचिती शिल्लक राहिली.ते वायूतत्त्वही आकाशात लय पावल्यावर तो नादही मावळून गेला व *माउलींची संजीवन समाधीची प्रक्रिया पूर्ण झाल्याचे सर्वांना समजले.* "संजीवन समाधीचा अर्थ असा नाही की,माउलींनी देहत्याग केला.याच्या उलट प्रक्रियेने त्यांना केव्हाही हवे तेव्हा पुन्हा देहावर येता येते.मग ते जसे समाधीच्या पूर्वी होते तसेच पुन्हा आपल्याला दिसू लागतील.

"संजीवन सामाधीच्या रूपाने ते विश्वाकार होऊन राहिलेले आहेत.


जिवंत समाधी आणि संजीवन समाधी यात हाच फार मोठा फरक आहे. 'जातस्यहि ध्रुवो मृत्यु:' या नियमानुसार जिवंत समाधी घेतलेल्या महात्म्यांचा पांचभौतिक देह कालांतराने विघटन पावतो,कारण तो असा तत्त्वांचा लय करून अदृश्य केलेला नसतो.ही माहिती नसल्यामुळेच सामान्यपणे लोक जिवंत समाधीला संजीवन समाधी म्हणतात.परंतु *आजवर केवळ आणि केवळ भगवान श्री ज्ञानेश्वर माउलींनीच अशी संजीवन समाधी घेतलेली आहे. म्हणूनच सद्गुरु श्री माउलींची ही संजीवन समाधी एकमेवाद्वितीय म्हटली जाते !* इथे कोणाही महात्म्यांची मी श्री माउलींशी तुलना करत नाहीये.जिवंत समाधी घेतलेले सर्व महात्मे श्री माउलींसारखेच थोर आणि पूजनीयच आहेत. फक्त जो वास्तविक भेद आहे दोन्हीतला तेवढाच मी येथे मांडत आहे.कृपया कोणीही तसा गैरसमज करून घेऊ नये.


*श्रीसंत महात्मे यासाठीच श्रीक्षेत्र आळंदीला व सद्गुरु श्री माउलींच्या समाधीला "नित्यतीर्थ" म्हणतात. हे कधीच नष्ट न होणारे असे कालजयी तीर्थ आहे,म्हणूनच ते नित्यतीर्थ होय.* 

श्री माउलींचे समाधीविवर हे सूक्ष्म स्तरावरील आहे.तेथे पंचभौतिकताच नाही कसलीही. त्यामुळे तेथे प्रवेश करण्यासाठी आपला हा पांचभौतिक देह उपयोगाचा नसतो.तेथे केवळ दिव्य देहानेच प्रवेश होऊ शकतो.या समाधीविवराला कालाचा स्पर्शच नाहीये. *तिथे काळ कार्यच करीत नसल्याने, त्यावेळी आत वाहिलेली फुले आजही जशीच्या तशी टवटवीत आहेत.त्यावेळी ठेवलेला पंचखाद्याचा नैवेद्यही साडेसातशे वर्षे उलटली तरी जसाच्या तसाच आहे.*


सद्गुरु श्री माउलींच्या कृपेने या समाधिविवराच्या आत जाण्याचे सद्भाग्य आजवर केवळ बोटावर मोजण्या ईतक्या सत्पुरुषांनाच लाभलेले आहे.पण आश्चर्य म्हणजे या सर्व महात्म्यांनी आतील देखाव्याचे केलेले वर्णन शब्दश: एकच आहे. माउलींच्या समाधिसोहळ्यास श्रीसंत जनाबाई उपस्थित नव्हत्या. म्हणून त्या जेव्हा त्यानंतर पहिल्यांदा आळंदीला आल्या, त्यावेळी माउलींनी त्यांना संजीवन समाधीचा तो संपूर्ण सोहळा दिव्यदृष्टीने पुन्हा दाखवला होता. श्री माउलींचे त्यांच्यावर पुत्रवत् प्रेम होते, म्हणूनच जनाबाईंसाठी त्यांनी ही विलक्षण लीला केली.


श्रीसंत एकनाथ महाराजांचा प्रसंग आपल्याला सर्वांना ज्ञात आहेच.माउलींच्या गळ्याला टोचणारी अजानवृक्षाची मुळी कापण्यासाठी ते या समाधी विवरात गेले होते.त्यानंतर साधारणपणे दोनशे वर्षांपूर्वी,श्री चिदंबर महास्वामींच्या शिष्या श्रीसंत विठाबाई महाराजांना श्री माउलींच्या कृपेने हे सद्भाग्य लाभले.


गंमत म्हणजे श्रीसंत विठाबाईंचे अभंग मला काही वर्षांपूर्वी वाचायला मिळाले होते.


सद्गुरु श्री ज्ञानदेवांच्या समाधिस्थ स्वरूपाविषयी आपल्या "श्रीज्ञानदेव विजय" ग्रंथातील ओळ


ज्ञानेशांची समाधिस्थिती ।


पुनश्च येणे देहावरती ।


याची घेतली प्रचिती ।


त्रिशतकोत्तर नाथांनी ॥१५.६३॥


पूर्वजांनी जया पाहिले ।


तया नाथांनीही देखिले ।


आजही तैसेचि संचले ।


समाधिस्थ ज्ञानेश्वर ॥१५.६५॥


भगवान सद्गुरु श्री ज्ञानेश्वर महाराज हे नित्यअवतार असल्याने,आजही त्याच रूपाने समाधिस्थ राहून ते आपल्या भक्तांवर कृपाप्रसाद करीत आहेत. "कलियुगात देव एक ज्ञानेश्वर महाराजच आहेत."


सद्गुरु श्री माउली हे जसे एकमेवाद्वितीय ( Unique ) अवतार आहेत, तशीच त्यांची संजीवन समाधी देखील एकमेवाद्वितीयच आहे. त्यांच्यासारखे केवळ तेच ! अलौकिक, अद्भुत, अनिर्वचनीय आणि अपरंपार कनवाळू !! त्यांचे पावन नाम घेण्याची, त्यांच्या दिव्य चरित्राचे अनुसंधान राखण्याची आणि त्यांचेच स्वरूप असणारे त्यांचे वाङ्मय वाचण्याची,त्याचे मनन-चिंतन करण्याची संधी व सद्बुद्धी दोन्ही आपल्याला लाभत आहे, हेच माउलींची आपल्यावर अद्भुत कृपा असल्याचे प्रतीक आहे, यात शंकाच नाही ! या देवदुर्लभ भाग्यासाठी परमकनवाळू करुणाब्रह्म भगवान सद्गुरु श्री ज्ञानेश्वर महाराजांच्या श्रीचरणीं, सर्वांच्या वतीने कृतज्ञतापूर्वक अनंतकोटी दंडवत प्रणाम करून त्याच अनुपम-सुखदायक श्रीचरणीं, त्यांच्या महन्मंगल जयंतीपर्वाच्या पूर्वसंध्येला तुलसीदल रूपाने विसावून धन्य होतो !

सोमवार, 28 जून 2021

उत्तर गोलार्द्धका प्राचीन मॅप

 पुराणों में भारत के ३ अर्थ हैं-

(१) उत्तर गोलार्ध का नक्शा ४ खण्डों में बनता था जिसे सुमेरु के ४ पार्श्व कहते थे। इसके पार्श्वों के ४ रंग कहे गये हैं, जो नक्शे में दिखाये जाते थे। आज भी नक्शे के लिए ४ रंगों का ही प्रयोग होता है। इसका गणितीय प्रमाण कई लाख पदों में है, जिसे कम्प्यूटर द्वारा ही प्रमाणित किया जा सकता है। इस सुमेरु का आधार विषुव रेखा को स्पर्श करता हुआ वर्ग है तथा इसकी ऊंचाई १ लाख योजन है जो मेरु पर्वत की ऊंचाई कही गयी है। इसकी सतह पर पृथ्वी गोल के सतह विन्दुओं के प्रक्षेप से समतल नक्शा बनता था। आयताकार नक्शा बनने पर ध्रुव प्रदेश का आकार अनन्त हो जाता है। उत्तरी ध्रुव में कोई समस्या नहीं है क्योंकि यहां केवल जल भाग है। दक्षिण गोल में ध्रुव प्रदेश स्थल भाग है जिसका आकार अनन्त हो जाता है। अतः इसे अनन्त द्वीप कहते थे। उत्तरी गोल के ९०-९० अंशों के ४ खण्डों को भू-पद्म का ४ दल कहा गया है। इनके नाम हैं-भारत, पूर्व में भद्राश्व, पश्चिम में केतुमाल, विपरीत दिशा में कुरु वर्ष। यहां भारत का अर्थ हुआ उज्जैन के दोनों तरफ ४५-४५ अंश पूर्व पश्चिम तथा विषुव से ध्रुव प्रदेश तक का भाग है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार उज्जैन से ९० अंश पूर्व यमकोटिपत्तन, ९० अंश पश्चिम रोमक पत्तन, तथा विपरीत दिशा में सिद्धपुर है। पुराणों के अनुसार भारत के पूर्व छोर पर इन्द्र की अमरावती, पश्चिम छोर पर यम की संयमनी (सना, अम्मान, मृत सागर, यमन), अमरावती से ९० अंश पूर्व वरुण की सुखा (हवाई द्वीप या फ्रेञ्च पोलिनेसिया), १८० अंश पूर्व सोम की विभावरी (न्यूयार्क या सूरीनाम) है। भारत भाग को छोड़ कर उत्तर के ३ तथा दक्षिण के ४ खण्ड ७ तल या पाताल हैं।
(विष्णु पुराण २/२)-भद्राश्वं पूर्वतो मेरोः केतुमालं च पश्चिमे। वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठ तयोर्मध्यमिलावृतः॥२४॥
भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा। पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः।४०॥
विष्णु पुराण (२/८)-मानसोत्तर शैलस्य पूर्वतो वासवी पुरी।
दक्षिणे तु यमस्यान्या प्रतीच्यां वारुणस्य च। उत्तरेण च सोमस्य तासां नामानि मे शृणु॥८॥
वस्वौकसारा शक्रस्य याम्या संयमनी तथा। पुरी सुखा जलेशस्य सोमस्य च विभावरी॥९॥
सूर्य सिद्धान्त (१२/३८-४२)-भू-वृत्त-पादे पूर्वस्यां यमकोटीति विश्रुता। भद्राश्व वर्षे नगरी स्वर्ण प्राकार तोरणा॥३८॥
याम्यायां भारते वर्षे लङ्का तद्वन् महापुरी। पश्चिमे केतुमालाख्ये रोमकाख्या प्रकीर्तिता॥३९॥
उदक् सिद्धपुरी नाम कुरुवर्षे प्रकीर्तिता॥४०॥ भू-वृत्त-पाद विवरास्ताश्चान्योऽन्यं प्रतिष्ठिता॥४१॥
स्वर्मेरुर्स्थलमध्ये नरको बड़वामुखं च जल मध्ये (आर्यभटीय, ४/१२)
मेरुः स्थितः उत्तरतो दक्षिणतो दैत्यनिलयः स्यात्॥३॥ एते जलस्थलस्था मेरुः स्थलगोऽसुरालयो जलगः।
(लल्ल, शिष्यधीवृद्धिद तन्त्र, १७/३-४)
उत्तर में भारत के पश्चिम (अतल, केतुमाल), पूर्व में सुतल, विपरीत दिशा में पाताल है। दक्षिण में भारत के दक्षिण तल या महातल (दोनों कुमारिका खण्ड, वर्तमान काल में भारत देश तथा भारत समुद्र), अतल के दक्षिण तलातल, सुतल के दक्षिण वितल, पाताल के दक्षिण रसातल है।
विष्णु पुराण (२/५)-दशसाहस्रमेकैकं पातालं मुनिसत्तम।
अतलं वितलं चैव नितलं च गभस्तिमत्। महाख्यं सुतलं चाग्र्यं पातालं चापि सप्तमम्॥२॥
शुक्लकृष्णाख्याः पीताः शर्कराः शैल काञ्चनाः। भूमयो यत्र मैत्रेय वरप्रासादमण्डिताः॥३॥
पातालानामधश्चास्ते विष्णोर्या तामसी तनुः। शेषाख्या यद्गुणान्वक्तुं न शक्ता दैत्यदानवाः॥१३॥
योऽनन्तः पठ्यते सिद्धैर्देवो देवर्षि पूजितः। स सहस्रशिरा व्यक्तस्वस्तिकामलभूषणः॥१४॥
(२) भारत वर्ष के ९ खण्ड हिमालय के मध्य भाग (कैलास) को पूर्व-पश्चिम समुद्र तक फैलाने पर उससे दक्षिण समुद्र तक है। भारत या कुमारिका खण्ड वर्तमान भारत (पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल, तिब्बत सहित) है। अन्य खण्ड हैं-इन्द्रद्वीप (बर्मा, थाइलैण्ड, कम्बोडिया, वियतनाम, कम्बोडिया जिसमें वैनतेय जिला है ), नागद्वीप (अण्डमान-निकोबार, पश्चिमी इण्डोनेसिया), कशेरुमान् (पूर्व इण्डोनेसिया, बोर्नियो, न्यूगिनी, फिलिपीन), सौम्य (उत्तर में तिब्बत), गन्धर्व (अफगानिस्तान, ईरान), वारुण (इराक, अरब), ताम्रपर्ण (तमिल के निकट सिंहल या वर्तमान श्रीलंका, लंका (लक्कादीव से मालदीव तक)।
मत्स्य पुराण, अध्याय ११४-
अथाहं वर्णयिष्यामि वर्षेऽस्मिन् भारते प्रजाः। भरणाच्च प्रजानां वै मनुर्भरत उच्यते॥५॥
निरुक्तवचनाच्चैव वर्षं तद् भारतं स्मृतम्। यतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यमश्चापि हि स्मृतः॥६॥
न खल्वन्यत्र मर्त्यानां भूमौकर्मविधिः स्मृतः। भारतस्यास्य वर्षस्य नव भेदान् निबोधत॥७॥
इन्द्रद्वीपः कशेरुश्च ताम्रपर्णो गभस्तिमान्। नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुणः॥८॥
अयं तु नवमस्तेषं द्वीपः सागरसंवृतः। योजनानां सहस्रं तु द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरः॥९॥
आयतस्तु कुमारीतो गङ्गायाः प्रवहावधिः। तिर्यगूर्ध्वं तु विस्तीर्णः सहस्राणि दशैव तु॥१०॥
(३) भारत पद्म के लोक-भारत नक्शे के ७ लोक आकाश के ७ लोकों के नाम पर हैं-भू (विन्ध्य से दक्षिण), भुवः (विन्ध्य-हिमालय के बीच), स्वः (त्रिविष्टप = तिब्बत स्वर्ग का नाम, हिमालय), महः (चीन के लोगों का महान् = हान नाम था), जनः (मंगोलिया, अरबी में मुकुल = पितर), तपः (स्टेपीज, साइबेरिया), सत्य (ध्रुव वृत) इन्द्र के ३ लोक थे-भारत, चीन, रूस।
ब्रह्माण्ड पुराण, उपसंहार पाद, अध्याय २ (३/४/२)-
लोकाख्यानि तु यानि स्युर्येषां तिष्ठन्ति मानवाः॥८॥
भूरादयस्तु सत्यान्ताः सप्तलोकाः कृतास्त्विह॥९॥
२. नेपाल भाग-नेपाल भारत के उत्तर भाग हिमालय का भाग है। उत्तर-दक्षिण के ३ भागों-भू, भुवः स्वः में भुवः या मैदानी भाग मध्यदेश है जिसे आज भी नेपाल में मधेस कहते हैं। राजा दिलीप तथा पुरुरवा को भी मध्यम-लोक का राजा कहा गया है (रघुवंश, २/१६, विक्रमोर्वशीयम्, अंक १ में मेनका द्वारा पुरुरवा का स्वागत)। बाइबिल में भी इसे सिधु के पूर्व का मेडेस कहा है। एक अन्य मेडेस ईरान पर्वत के पश्चिम मैदानी भाग था।
७ लोकों के अनुसार चीन का महः लोक मध्यम लोक है। अतः चीन को मध्य राज्य कहा जाता था।
स्वः लोक के ३ भाग हैं, जिनको ३ विटप कहा है। विटप का अर्थ वृक्ष है, जिसकी हजारों जड़ें भूमि से जल खींच कर पत्तों तक पहुंचाती हैं। इसी प्रकार भूमि पर जो जल गिरता है, वह हजारों स्रोतों से बह कर एक नदी धारा रूप में निकलता है। समुद्र में मिलने के पहले धारा कई भागों में बंट जाती है जिसे धारा का विपरीत राधा कहते हैं। अतः अंग देश (पश्चिम बंग) के राजा कर्ण को राधा-नन्दन कहते थे। ३ विटपों का केन्द्र कैलास पर्वत है। पश्चिमी भाग विष्णु-विटप है जिसका जल सिन्धु नद द्वारा निकलता है और जिस समुद्र में मिलता है उसे सिन्धु समुद्र तथा तटीय भाग को भी सिन्धु देश कहते हैं। मध्य में शिव-विटप है जिससे गंगा नदी निकलती है। यह गंगा सागर (बंगाल की खाड़ी) में मिलती है। गंगा समुद्र के शासकों को गंग कहते थे (ओड़िशा का राजवंश)। अतः कहते हैं कि शिव जटा से गंगा निकली है। यह ब्रह्मा के कमण्डल में लुप्त होती है। क = जल, इसका मण्डल कमण्डल है। ब्रह्मदेश (बर्मा, अभी म्याम्मार) के पश्चिम तथा दक्षिण भारत के पूर्व तट के बीच कमण्डल है। कमण्डल का पश्चिम तट कर-मण्डल या बंगला उच्चारण में कारोमण्डल है। पूर्व में ब्रह्म विटप है, जिससे ब्रह्मपुत्र नद निकला है। इसकी सीमा पर ब्रह्म देश है। ब्रह्मा को महा-अमर भी कहते थे, जिससे म्याम्मार हुआ।
नेपाल शिव विटप का पूर्व भाग है। केदारनाथ में शिव का पैर तथा पशुपतिनाथ में उनका सिर है।
इत्युक्तस्तु तदा ताभ्यां केदारे हिमसंश्रये। स्वयं च शंकरस्तस्थौ ज्योतीरूपो महेश्वरः॥७॥
तद्दिनं हि समारभ्य केदारेश्वर एव च। पूजितो येन भक्त्या वै दुःखं स्वप्नेऽति दुर्लभम्॥१२॥
यो वै हि पाण्डवान्दृष्ट्वा माहिषं रूपमास्थितः। मायामास्थाय तत्रैव पलायनपरोऽभवत्॥१३॥
धृतश्च पाण्डवैस्तत्र ह्यवाङ्मुखतया स्थितः। पुच्छ चैव धृतं तैस्तु प्रार्थितश्च पुनःपुनः॥१४॥
तद्रूपेण स्थितस्तत्र भक्तवत्सलनामभाक्। नयपाले शिरोभागो गतस्तद्रूपतः स्थितः॥१५॥
भारतीभिः प्रजाभिश्च तथेव परिपूज्यते॥१८॥ (शिव पुराण, कोटि रुद्र संहिता, अध्याय १९)
नेपाल मूलतः गण्डक घाटी का ही क्षेत्र था। मैदानी भागों पर मुस्लिम या ब्रिटिश आक्रमण के समय नेपाल के राजाओं ने पश्चिम के पर्वतीय भाग तथा तराई के निकट मैदानी भागों (मधेस) पर अधिकार कर लिया।
वराह पुराण, अध्याय १४५-
अन्यच्च गुह्यं वक्ष्यामि सालङ्कायन तच्छृणु।
शालग्राममिति ख्यातं तन्निबोध मुने शुभम्॥२८॥
योऽयं वृक्षस्त्वया दृष्टः सोऽहमेव न संशयः॥२९॥
मम तद् रोचते स्थानं गिरिकूट शिलोच्चये।
शालग्राम इति ख्यातं भक्तसंसारमोक्षणम्॥३२॥
गुह्यानि तत्र वसुधे तीर्थानि दश पञ्च च॥३४॥
तत्र विल्वप्रभं नाम गुह्यं क्षेत्र मम प्रियम्॥३५॥
तत्र कालीह्रदं नाम गुह्यं क्षेत्रं परं मम।
अत्र चैव ह्रदस्रोतो बदरीवृक्ष निःसृतः॥४५॥
तत्र शङ्खप्रभं नाम गुह्यं क्षेत्रं परं मम।४९॥
गुह्यं विद्याधरं नाम तत्र क्षेत्रे परं मम।
पञ्च धाराः पतन्त्यत्र हिमकूट विनिःसृताः॥६२॥
याति वैद्याधरान् भोगान् मम लोकाय गच्छति॥६४॥
शिला कुञ्जलताकीर्णा गन्धर्वाप्सरसेविता॥६५॥
गन्धर्वेति च विख्यातां तस्मिन् क्षेत्रं परं मम।
एकधारा पतत्यत्र पश्चिमां दिशोमाश्रिता॥६८॥
गन्धर्वाप्सरसश्चैव नागकन्याः सहोरगैः॥८०॥
देवर्षयश्च मुनयः समस्त सुरनायकाः।
सिद्धाश्च किन्नराश्चैव स्वर्गादवतरन्ति हि।८१॥
नेपाले यच्छिवस्थानं समस्त सुखवल्लभम्॥८२॥
एतद् गुह्यं प्रं देवि मम क्षेत्रे वसुन्धरे॥९७॥
अहमस्मिन् महाक्षेत्रे धरे पूर्वमुखः स्थितः।
शालग्रामे महाक्षेत्रे भूमे भागवतप्रियः॥९८॥
शाल वृक्षों के कारण यह शालग्राम तथा वहां के ऋषि को सालङ्कायन कहा है। गण्डकी नदी के पत्थरों को भी शालग्राम कहते हैं, जिन पर विष्णु का चिह्न चक्र जल प्रवाह में घिसने से अंकित हो जाता है।
कोसल तथा विदेह की सीमा बूढ़ी गण्डक को सदानीरा भी कहते थे। लिखा है कि सूर्य कर्क राशि में रहने से (आषाढ़ मास में) सभी नदियां जल से भरी रहती हैं, किन्तु सदानीरा में सदा जल रहता है।-
तर्हि विदेघो माथव आस । सरस्वत्यां स तत एव प्राङ्दहन्नभीयायेमां पृथिवीं
तं गोतमश्च राहूगणो विदेघश्च माथवः पश्चाद्दहन्तमन्वीयतुः स इमाः
सर्वा नदीरतिददाह सदानीरेत्युत्तराद्गिरेर्निर्घावति -- (शतपथ ब्राह्मण, १/४/१/१४)
अथादौ कर्कटे देवी त्र्यहं गङ्गा रजस्वला। सर्व्वा रक्तवहा नद्यः करतोयाम्बुवाहिनी॥ इति भरतः।
३. अन्य नाम-
(१) गुह्य-गुह्य काली का स्थान होने के कारण यह गुह्य देश था तथा इसके निवासियों को गुह्यक कहते थे (वराह पुराण उद्धरण)। गुह्यक की देव जातियों में गणना है जो हिमालय या स्वः लोक की जातियां थीं।
गुह्यकाल्या महास्थानं नेपाले यत् प्रतिष्ठितम्। (देवी भागवत पुराण, ७/३८/११)
वाराणसी कामरूपं नेपालं पौण्ड्रवर्धनम्॥ (ब्रह्माण्ड पुराण, ३/४/४४/९३-५१ शक्तिपीठ)
पौण्ड्रवर्धन नेपालपीठं नयनयोर्युगे (वायु पुराण, १०४/७९)
दुर्द्धर्षोनाम राजाभून्नेपालविषये पुरा। पुण्यकेतुर्यशस्वी च सत्यसंधो दृढव्रतः॥२॥
क्व गतो हि महीपाल नेपालविषयस्तव॥२९॥ (स्कन्द पुराण, ५/२/७०)
विक्रमादित्य ने शकों के नाश तथा धर्म रक्षा के लिए गुह्य देश में शिव का तप किया था।
भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व १, अध्याय ७-
शकानां च विनाशार्थमार्यधर्म विवृद्धये। जातश्शिवाज्ञया सोऽपि कैलासाद् गुह्यकालपात्॥१५॥
विक्रमादित्य नामानं पिता कृत्वा मुमोद ह। स बालोऽपि महाप्राज्ञः पितृमातृ प्रियङ्करः॥१६॥
(२) रुरु-रुरु मृगों द्वारा एक तपस्विनी कन्या का पालन हुआ था, अतः इसे रुरु क्षेत्र भी कहा गया।
(वराह पुराण, अध्याय १४६)
(३) गोस्थल-यहां से गायें निकल गयीं थी, जहां महर्षि और्व ने पुनः गायों को बसाया। अतः इसे गो-निष्क्रमण तथा गाय बसाने पर गोस्थलक नाम हुआ। (वराह पुराण, अध्याय १४७) गोरक्ष या गोरखा नाम का यह मूल हो सकता है। यहां के महाभारत पूर्व के राजाओं को भी गोपाल वंश का कहा गया है। कश्मीर के प्राचीन राजा गोनन्द वंश के थे।
(४) नेपाल-नेपाल नाम का उल्लेख गुह्य काली क्षेत्र के वर्णनों में हुआ है। इससे वहां की एक जाति का नाम नेवार हुआ है। नेपाल नाम के विषय में बहुत सी कल्पना हैं।
लेपचा भाषा में ने = पवित्र, दिव्य तथा पाल = गुहा। उस भाषा में यह गुह्य का अनुवाद है।
नेवारी भाषा में ने = मध्य, पाल = देश। यह मध्य के शिव विटप का भाग है।
तिब्बती भाषा में नेपाल का अर्थ ऊन का क्षेत्र है। लिम्बू भाषा में नेपाल का अर्थ है समतल भाग। यह तराई भाग के लिए है।
एक अन्य कथा है कि यहां का राजा २२वें जैन तीर्थंकर नेमि-नाथ का शिष्य था। नेमिनाथ द्वारा पालित होने से भी यह नेपाल हुआ। नेमिनाथ भगवान् कृष्ण के भाई थे। उनके भाइयों में केवल युधिष्ठिर ही राजा बने थे और कृष्ण के परलोकगमन के बाद संन्यासी रूप में २५ वर्ष तक पूरे भारत का भ्रमण किया। भारत में भी ओंकारेश्वर क्षेत्र नेमाळ (नेमाड़) है। ओड़िशा में भी नेमाळ एक सिद्ध पीठ है।
४. देव जातियां-त्रिविष्टप का अर्थ स्वर्ग है तथा उस क्षेत्र की जातियों को देव जातियां कहा गया है।
विद्याधराप्सरो यक्ष रक्षो गन्धर्व किन्नराः।
पिशाचो गुह्यको सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः॥ (अमरकोष, १/१/११)
नेपाल के या गण्डकी क्षेत्र के गुह्यक हुए। भूत देश भूटान है, जहां भूत लिपि प्रचलित थी। यक्ष कैलास के निकट के थे, जहां कुबेर का शासन था। कुबेर का स्थान शून्य देशान्तर पर स्थित था (प्राचीन काल में उज्जैन का देशान्तर), जो कैलास से थोड़ा पूर्व होगा। ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/१८)
मध्ये हिमवतः पृष्ठे कैलासो नाम पर्वतः। तस्मिन्निवसति श्रीमान्कुबेरः सह राक्षसैः॥१॥
अप्सरो ऽनुचरो राजा मोदते ह्यलकाधिपः। कैलास पादात् सम्भूतं पुण्यं शीत जलं शुभम्॥२॥
मदं नाम्ना कुमुद्वत्त्तत्सरस्तूदधि सन्निभम्। तस्माद्दिव्यात् प्रभवति नदी मन्दाकिनी शुभा॥३॥
दिव्यं च नन्दनवनं तस्यास्तीरे महद्वनम्। प्रागुत्तरेण कैलासाद्दिव्यं सर्वौषधिं गिरिम्॥४॥
मत्स्य पुराण (१२१/२-२८)
मध्ये हिमवतः पृष्ठे कैलासो नाम पर्वतः। तस्मिन् निवसति श्रीमान् कुबेरः सह गुह्यकैः॥२॥
अप्सरो ऽनुगतो राजा मोदते ह्यलकाधिपः। कैलास पाद सम्भूतं पुण्यं शीत जलं शुभम्॥३॥
मन्दोदकं नाम सरः पयस्तु दधिसन्निभम्। तस्मात् प्रवहते दिव्या नदी मन्दाकिनी शुभा॥४॥
शून्य देशान्तर पर होने के कारण अलका, उज्जैन या लंका का समय पृथ्वी का समय था। कुबेर नाम का यही अर्थ है-कु = पृथ्वी, बेर = समय।
कुबेर के अनुचरों को यक्ष तथा ऊपर के श्लोकों में अप्सर कहा है। आजकल भी राजा के अनुचरों को अफसर कहते हैं, जो संस्कृत, पारसी मूल से अंग्रेजी में गया है।
विद्याधर तथा सिद्ध लासा तथा उसके पूर्व के भाग के हैं। पिशाच कैलास से पश्चिम के थे जिनकी पैशाची भाषा मंअ बृहत्-कथा थी। किन्नर कैलास के दक्षिण पश्चिम के थे। हिमाचल का उत्तरी भाग किन्नौर है।

रविवार, 27 जून 2021

जोधपूरमधील, पाठ, कंबर यावर उपचार करणारे जादूगार

 जोधपूरमधील त्या ‘दोन अंगठ्याची’ कमाल

मान, पाठ, कंबर यावर उपचार करणारे जादूगार

मधुकर भावे 

डॉ गोवर्धनलाल पराशर जोधपुर Mobile No. - 9414130012, Address - Sardarpura 'D' Road, Jodhpur

आॅगस्ट-सप्टेंबर २०२० च्या दोन महिन्यात माझी स्व.पत्नी मंगला तिची प्रकृती गंभीर झाल्यामुळे पिंपरी-चिंचवड येथील डॉ.डी.वाय.पाटील रुग्णालयात दाखल होती. त्या संस्थेचे प्रमुख डॉ.पी.डी.पाटील यांच्या तत्परतेने मंगलावर सुयोग्य उपचार चालू होते. या काळात किमान २०-२२ वेळा मुंबई-पिंपरी-चिंचवड अशा खेपा होत होत्या. पत्नीच्या आजारात या प्रवासाचा एक विपरीत परिणाम माझ्या कमरेच्या हाडांवर कधी झाला ते मला कळलेच नाही. कंबर दुखू लागली, पायापर्यंत चमक मारु लागली. मंगलाच्या आजारपणामुळे माझ दुखण महत्वाच नव्हतं, त्यामुळे ते अंगावर काढल. त्यानंतर चालण असह्य झालं. म्हणून प्रथम डॉ.सुबोध मेहता मग डॉक्टर कपिल अशा नामवंत वैद्यक शास्त्र्यांकडून तपासणी झाली, एम.आर.आय झाला, इंजेक्शन झाली, गोळ्या सुरु झाल्या. चालता येईना, दुखण थांबेना. वेदना असह्य झाल्यावर आणि दुखण बर होत नाही अस जाणवल्यावर निराशा येत गेली त्यातच मंगलाचे हृदयविकाराच्या तीव्र झटक्याने निधन झाले, निराशेत आणखी भर पडली. काय उपचार करावे सुचत नव्हते, डॉक्टरांनी मणक्याचे आॅपरेशन सुचवले, पण ते करणे धोक्याचे आहे, असे त्यांनीच मत दिले. आता काय करायचे?.. काही प्रश्नांची उत्तर नियती देत असते. एक दिवस अचानक माझे दोन मित्र श्री. किशोर अग्रहाळकर (नवी मुंबईचे माजी नगररचनाकार) आणि श्री. अशोक मुन्शी माझ्याकडे आले. माझ दुखण पाहून त्यांनी सुचवलं की, ‘जोधपुरला चला’ असं सांगायलाच आलो आहोत. दोन्ही जिव्हाळ्याचे मित्र. जोधपूरला उपाय काय माहित नाही, त्यांच्यावर विश्वास ठेऊन जोधपूरला जायचं ठरले. त्यांनी सांगितले की, डॉ. गोवर्धनलाल पाराशर हे विख्यात डॉक्टर दोन अंगठयांनी कंबर, मणका, मान, पाय याठिकाणी ज्या मांसपेशीमध्ये शीर दबलेली असते तिला बरोबर मार्गी लावतात आणि अवघी दहा मिनीटाची त्यांची जादू. करुन तर बघा.... चार डॉक्टर झाले होते, चार प्रयोग झाले होते. पाचवा प्रयोग करु या, असं समजून जोधपूरला निघालो, सोबत माझी सुविद्य कन्या डॉ. मृदूला (एम.एस. एफ.आर.सी.एस) हीसुध्दा होती. विमानात बसताना पायंड्या चढता आल्या नाहीत. व्हिलचेअरवरुन आत जावे लागले. उतरताना व्हिलचेअरची गरज लागली.... पुढे काय होणार माहित नव्हते. ४० मिनीटात

डॉ. पराशर यांच्या ‘आॅस्टियोपॅथी’ प्रयोगासाठी त्यांच्यासमोर उभा राहीलो. त्यांनी उपचार सुरु केले. त्यांच्या रुग्णालयात सकाळी ८ वाजल्यापासून संध्याकाळी ५ पर्यंत रोज ३०० लोकांवर, या सर्व व्याधींवर उपचार केले जातात. त्यांचे बंधू डॉक्टर नंदु, ज्येष्ठ चिरंजीव डॉ. गिरीराज, दुसरे चिरंजीव डॉ.महेश आणि अन्य डॉक्टर सहकारी अशा १२ जणांची टीम ३०० रुग्णांवर पाचवाजेपर्यंत उपचार करते. जे रुग्ण लंगडत आलेले असतात, ज्या रुग्णांना कमरेला विळखा घालून उचलून आणलेले असते... अशा अनेक व्याधी असलेले रुग्ण जवळपास रडत रडतच येतात आणि १० मिनीटाच्या उपचारानंतर टकाटक चालत, हसत आनंदाने परतताना दिसतात, ते सर्व मी बघत होतो. डॉक्टर गोवर्धनजी मला म्हणाले ‘आपका तो कुछ भी नही है। दो दिन मे ठीक होके मुंबई जाओगे।...’ मी ऐकत होतो. पाचवा प्रयोग आहे असच म्हणत होतो. डॉक्टरांच्या सोबत उपचाराच्या खोलीत गेलो. एका रुंद टेबलावर त्यांनी झोपवलं. दोन अंगठयांनी मणक्याची शीर दाबायला सुरुवात करुन कमरेपर्यंत दोन अंगठ्यात दुखरी शीर पकडत ते खालपर्यंत येत होते, पुन्हा वर जात होते... मला फरक जाणवू लागला. पायापर्यंत जाणारी चमक पहिल्या पाच मिनीटात कमी झाल्याच जाणवलं. पुढच्या पाच मिनिटानंतर डॉक्टर म्हणाले, ‘चलो उठो.... आप खुद चल के जा सकते हो।’... मी टेबलवरुन खाली उतरलो. माझी पावलं ताड-ताड पडू लागली. काय झालयं मलाच समजेना आवाजात एकदम फरक पडला, उत्साहात फरक पडला.  नियती काय घडवतं असते. त्याचा अनुभव करत होतो.  डॉक्टरसाहेबांजवळ येऊन बसलो.... कैसा महसूस कर रहे हो।... त्यांच्या प्रश्नावर इतकच म्हणालो की, ‘विश्वास बसत नाही असं काही तरी घडलं आहे. पुराणामध्ये एक कथा आहे की, भगवान श्रीकृष्णांन एका करंगळीवर अख्खा गोवर्धन पर्वत उचलला होता... मोठी रोचक कथा आहे. त्याचे मित्र असलेले पेंदे काठ्या टेकून उभे होते, पर्वत उचलला होता श्रीकृष्णाच्या करंगळीवर , ते बघायला कुणीच गेल नाही. पण माझ्या समोरच्या डॉक्टरांनी हाताच्या दोन अंगठयांवर हजारो रुग्णांची व्यथा आणि पिडा गोवर्धन पर्वतासारखीच उचलली आणि त्यांची पिडा दूर केली. विलक्षण योगायोग म्हणजे त्या वैद्यकशास्त्राच नाव डॉक्टर गोवर्धनच आहे. अंगठयाची कमाल आहे. सेवेची आणि ‘आॅस्टियोपॅथीच्या अभ्यासाची ही साधना आहे.

डॉक्टरांनी एक पुस्तक हातात दिलं. उलटून बघितलं, विश्वास बसला नसता. फोटोसकट सगळी सचित्र माहिती होती. मान, पाठ, मणका, पोटºया एवढेच नव्हेतर हाताची एकमेकांवर चढलेली बोटं अशा अनंत व्याधी घेऊन डॉक्टरसाहेबांकडे कोणकोण आले आणि हे जागतिक किर्तीचे लोक अंगठयाच्या जादूने बरे होऊन गेले. त्यांनी कोणत्या कोणत्या शब्दात डॉक्टरांचं वर्णन कसं केलं... सगळ वाचून थक्क झाले. या उपचारामध्ये आहेत, भारताच्या माजी पंतप्रधान इंदिरा गांधी, अमेरिकेचे माजी राष्टÑपती डॉ. जॉर्ज बुश, बराक ओबामा, भारताचे माजी राष्टÑपती डॉ. अब्दुल कलाम, प्रतिभाताई पाटील, पंतप्रधान अटलबिहारी वाजपेयी, गुजरातचे त्यावेळचे मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, आजचे राजस्थानचे मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत, सिनेतारकांमध्ये देवानंद, राजेश खन्ना, धर्मेद्र, मिथुन चक्रवर्ती, सलमान खान, सनी देओल आणि शेवटची दोन नाव.... लता मंगेशकर आणि सचिन तेंडुलकर या सर्वांचे या ना त्या रुपात डॉक्टरांनी उपचार केलेले आहेत आणि त्या सर्वांच्या व्याधी दूर केलेल्या आहेत. मध्यप्रदेशचे माजी मुख््यमंत्रीु अर्जुनसिंग चक्क सहा दिवस दाखलच झाले होते. या महारथींच्यापेक्षा सुध्दा सकाळी ८ ते  संध्याकाळी ५ वाजेपर्यंत जी सामान्य माणसं येतात त्यांच्या चेहºयावरचा आनंद विलक्षण आहे आणि प्रत्येकाची फी फक्त रुपये १००/-....

आणखी एका किस्सा सांगतो. ख्यातनाम उद्योगपती मुकेश अंबानी यांच्या मातोश्री श्रीमती कोकिलाबेन अंबानी यांच्या उपचारासाठी त्यांना जोधपुरात आणलं होतं. तो योग साधून त्यांचा वाढदिवस मुकेशजींनी जोधपूरमध्ये साजरा केला. ४०० मित्रांना वाढदिवसाला बोलावलं, १० चॅटर्ड विमान आणली, सगळी फाईव्हस्टार हॉटेल्स बुक केली, ५ कोटी रुपये खर्च केला म्हणतात आणि नंतर डॉक्टर गोवर्धनलालजींना ते म्हणाले, ‘मी मुंबईमध्ये ५-२५ कोटी रुपये लावून तुमच्या उपचारांसाठी फाईव्हस्टार रुग्णालय उभं करतो, तुम्ही तिथे या. मला डॉक्टर गोवर्धनलाल यांची विशेषता यातच वाटते की, त्यांनी काय सांगितलं?..

‘मुकेशभाई, आपका वह सेंटर तो फाईव्हस्टार हॉटेलसेभी उपर के लेवलका होगा, जाहीर है की ऐसे संस्थानमे मै गरीब तो क्या, मध्यमवर्ग का आदमी भी पहुंच नही सकता, मै विनम्रतापूर्वक इसे स्वीकार नही कर सकता, क्योंकी, जहा, गरीब रुग्ण की मेरे हाथसे सेवा नही हो सकती ऐसे हेल्थकेअर सेंटर मे  मेरी विद्या किस काम की?....’

डॉक्टर गोवर्धनलाल पराशर यांची प्रखर मानसिकता, त्यांची उच्च विचारसरणी, व्यावसायाची निष्ठा आणि सामाजिक धाडस या सर्व गोष्टीचा परिचय त्या एकाच घटनेत होऊ शकतो.

सहा दिवस उपचार घेतले, आज मी टकाटक पूर्वीप्रमाणे झपाटून कामाला लागलो आहे. जगात १६०० कोेटी लोक राहतात, त्यांचे ३२०० कोेटी अंगठे आहेत पण जोधपूरमधले डॉक्टर गोवर्धनलाल पाराशर यांचे दोन अंगठे जगातल्या ३२०० कोटी अंगठयांपेक्षा वेगळे अंगठे आहेत. ‘अंगठा दाखवला’ असा मराठीतला वाकप्रचार फार वाईट अर्थाने वापरला जातो. जोधपूरले हे दोन अंगठे कमाल करणारे अंगठे आहेत. मी मुंबईला परत निघताना डॉक्टरसाहेबांना सांगितलं की,....

‘डॉक्टरसाहब, आपका तहेदिलसे ऋणी हू। आज मुंबई जा रहा हू। जोधपूर के दोन अंगुठे का डंका मुंबई आणि पुरे महाराष्टÑ मे बजानेकी मेरी जिम्मेदारी, आप से मेरा इतनाही वादा....’

मुंबईला आल्यावर अनेक महिने थांबलेला व्यायाम पूर्ववत सुरु केला आहे. मंगलाच्या निधनाने दु:ख पचवून पुन्हा कामाला सुरुवात केली आहे. डॉक्टर गोवर्धन यांची ही यशस्वी गाथा महाराष्टÑभर सामान्य माणसाला उपयोगी पडेल यासाठी मुंबई, पुणे, नागपूर या दोन-तीन ठिकाणी डॉ. पाराशर यांची आरोग्य शिबीरे आयोजित करण्याचे काम सुरु केले आहे. नियती या कामात यश देते की नाही ते पाहूया.

रविवार, 4 अप्रैल 2021

*अखण्ड स्वास्थ्य* ८९.आत्मनिरीक्षण, भोजन

 🔮📖💥📖🔮

 *अखण्ड स्वास्थ्य*

           ८९.

  *रोग के निदान हेतु आत्म निरीक्षण करो ।* 

☝️  हे मानव रोगों की जांच के लिए आप जगह-जगह भटकते हो, डॉक्टरों से पूछते हो, मशीन वालों के चक्कर काटते हो कि शायद रोग का पता लग जाए । लेकिन कभी तुम अपना आत्म विश्लेषण नहीं करते ,आत्म निरीक्षण नहीं करते कि मेरा रोग क्यों हुआ ।

👉 प्रकृति का नियम है या सामान्य संसारिक लोगों की प्रवृति है । कि मनुष्य को अपनी भूल दिखाई नहीं देती, वह दूसरों के दोष तो बड़ी आसानी से ढूंढ लेता है पर अपने दोषों की, अपनी कमियों की सदा उपेक्षा किया करता है । उधर ध्यान ही नहीं देता कि हम भूल कहां कर रहे हैं, हम गलती कहां कर रहे हैं । अपनी कमियों को देखने के लिए मनुष्य को आत्मचिंतन की और मुड़ना पड़ता है , अपनी चेतना का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर लगाना पड़ता है, अपनी ही जागृति करनी पड़ती है । जिस तरह से मनुष्य दूसरों के दोष देखता है, उनकी समीक्षाएं करता है  ऐसे यही कुशलता वह अपने दोषों को देखने में प्रयुक्त करने लगे तो मानव कल्याण पथ के पथ पर बढ़ सकता है , स्वस्थ जीवन के सारे मार्ग खुल सकते हैं । जो व्यक्ति अपनी कमियों को देखने ,उन्हें सुधारने की ओर अग्रसर है वह देर तक ,दुरावस्थाओं में ,रोग ग्रस्त अवस्था में, विपदाओं में घिरा नहीं रह सकेगा । यह सिद्धांत जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है ।

 भौतिक शरीर का स्वास्थ्य हो या हमारा मानसिक स्वास्थ्य अथवा आत्मिक स्वास्थ्य , सब जगह मानव आशातीत  प्रगति कर सकता है ।

👉हे मानव तुम्हारी आंतरिक दुर्बलता ही तुम्हारा रास्ता रोके रहती है और सबसे बड़ी तुम्हारी जीवन की बाधा यही है, इसको हटाने के लिए जिस क्षण तुम कृत संकल्प हो जाओगे, उसी क्षण तुम्हारे भाग्य के, अखंड स्वास्थ्य के राजमार्ग खुलते चले जाएंगे । अपनी पात्रता को विकसित करना पड़ेगा ,अपना सारा का सारा ध्यान अपनी इसी लक्ष्य पूर्ति पर लगाना पड़ेगा , चेतना को एक ही केंद्र पर केन्द्रित करना पड़ेगा ।

 अपना आत्म निरीक्षण, आत्मचिंतन, आत्म सुधार के इसी नियम का अनुपालन प्रकृति करती है ,सृष्टि के आदि से लेकर अब तक यह शाश्वत नियम चला रहा है भविष्य में भी चलता रहेगा , इसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता है ।

 वर्षा का पानी सब जगह समान रूप से बरसता है लेकिन जहां  गड्ढा व गहराई होगी उसी में पानी भरेगा व अपनी पात्रता के हिसाब से गहराई के हिसाब से जल को धारण करेगा ।

 ऐसे ही जो भी अपनी त्रुटियां ढूंढने और उन्हें खोज कर निकालने के लिए सक्रिय रहते हैं या रहेगें उनके स्वास्थ्य जीवन का राजमार्ग सामने खड़ा होगा ।

        *भोजन

☝️ हे मानव भोजन जीवन की रक्षा व शरीर के पोषण के लिए होता है और भोजन बनाने वाला उतना ही भोजन बनाता है जितना कि वह खा सके व पचा सके , उसमें भी अपनी आवश्यकता के हिसाब से हल्का या गरिष्ठ स्तर का बनाता है जो उन्हें परेशानी पैदा न करें व उसकी शारीरिक आवश्यकता के अनुरूप हो । अगर भोजन बनाने में अति की गई तो वह बासी रह कर विकृत होगा, खाने में अति बरती गई तो अर्जीण होकर के शरीर को रोग ग्रस्त कर देगा , विषैला बना देगा , ऐसे ही हे मानव ज्ञान की साधना व अध्ययन उतना ही किया जाए जो सहजता से जीवन में उतर जाए । जो अनावश्यक ज्ञान जीवन में काम नहीं आता है ऐसे ज्ञान को अगर मस्तिष्क में संग्रह किया गया तो अति भोजन की तरह दूषित होकर के जीवन के हर क्षेत्र को, मस्तिष्क को विकृत करेगा और अधिक ज्ञान जो प्राप्त करने के बाद मस्तिष्क में जाकर जीवन में उतर नहीं पाया, अपचित भोजन की तरह  अर्जीण रूपी रोग उत्पन्न करने के समान, मन में अहंकार पैदा करके  मस्तिष्क को विकृत कर डालेगा ।अत: अपने जीवन के लक्ष्य के अनुरूप ज्ञान की साधना करो और  ज्ञान के सहारे, उसके पथ पर अपने जीवन के लक्ष्य की ओर अनुगमन करो । इसीमें जीवन का कल्याण होगा और वही ज्ञान सार्थक व तुम्हारे लिए हितकर होगा ।

अतः अपनी गहन दृष्टि से आत्म चिंतन, आत्म मंथन करते हुए अपनी विकृतियों को जीवन से दूर करो और हटाने का संपूर्ण पुरुषार्थ करो, इसीसे आपके जीवन का कल्याण होगा, परिवार, समाज और राष्ट्र  का कल्याण होगा ।

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शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

*अखण्ड स्वास्थ्य* ५१. डिंडोरी

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*अखण्ड स्वास्थ्य*

           ५१.

 *रोग के कारण* 

           २७.

  *प्रकृति की सफाई व्यवस्था में बाधा*

☝️ हमने आज से 50 वर्ष पहले अपने सामने, इन्हीं आंखों से देखा है कि लोग सामान्य अवस्था में बुखार, सर्दी, जुकाम, उल्टी, दस्त फोडे़- फुन्सी जो प्राथमिक चरण में होते है इनको कभी रोग नहीं मानते थे  जन सामान्य में मान्यता थी व उनका मानना था कि इस माध्यम से शरीर की गंदगी बाहर निकल रही है अतः इन्हें निकलने दो ।

☝️ आयुर्वेद में शरीर की शोधन क्रिया के लिए पंचकर्म विज्ञान के अंतर्गत वमन, विरेचन, लंघन, रक्त मोक्षण आदि तमाम प्रकार की प्रक्रियाओं का वर्णन आता है वे कृत्रिम शोधन  क्रियायें है ।

👉 मानव के शरीर में जब  विजातिय पदार्थ यानी विषैले तत्व अधिक बढ़ जाते हैं । आहार-विहार की गड़बड़ी से या भोजन में गए विषैले पदार्थ जो विभिन्न माध्यमों  से शरीर में पहुँच गये ।

 ☝️प्रकृति उस जहर को शरीर से बाहर निकलने का उपक्रम करती है ।

👉जब शरीर में गंदगी बढ़ जाती है तो वायु प्रबल होकर के दस्तों के द्वारा उस गंदगी को बाहर निकालने की प्रक्रिया संपन्न करती है । 

👉पित्त बढ़ जाता है दूषित पदार्थ आमाशय में इकट्ठे होते हैं तो भूख लगना बंद हो जाती है, एसिडिटी बढ़ जाती है, पेट में जलन होने लगती है तो प्रकृति उन्हें वमन के द्वारा बाहर निकालने की कोशिश करती है ,जी मचलना ,सिर दर्द होना, सुस्ती आना, मुंह सूखना, मुंह में पानी आना, खट्टापन लगना पहले ये सब लक्षण प्रकट होते हैं उसके बाद उल्टियां शुरू हो जाती है प्राचीन समय में सभी समझदार लोग गुनगुना पानी पी कर जल्दी जल्दी  उल्टियां होने देते और शरीर का सारा जहर बाहर निकाल देते थे और ऐसे ही सर्दी जुखाम बहती तो उसको रोकते नहीं थे उसको पूरी तरह बहा कर के 3 दिन के अंदर में बढ़े हुए कफ को निकालकर शरीर का संतुलन बना देते ।

☝️लेकिन वर्तमान के युग में, इन 50 वर्षों में जब से एलोपैथिक दवाइयां आयी व इन दवाइयों का ऐसा प्रचार किया, सिर का दर्द हुआ तो आनंद कर लो, एना सीन लो इतनी विभिन्न प्रकार की दवाइयों का प्रचार किया और आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा ने भी ऐसी दवाई बनायी जो जरा सा कुछ हुआ नहीं कि उसकी गोली ले ली और  उपद्रव बंद। इंजेक्शन लगाया समस्या बंद ।

👉 इस तरह मानव ने प्रकृति की सफाई व्यवस्था को बंद करके  शरीर में विषों को रुकने का मार्ग प्रशस्त कर दिया, रास्ता साफ कर दिया और शरीर में रूके व बढ़े विषैले तत्वों ने असाध्य और भयंकर बीमारियों को जन्म दिया । दवाइयों के, जांचों के, बीमारियों के जाल में पूरी विश्व मानवता बुरी तरह फंस चुकी है और इन औषधियों के बाजार ने मानव को अज्ञान के गहन अंधकार में धकेल कर समाज फैले, जन जन में प्रविष्ठ आयुर्वेद के मूल ज्ञान व जीवन विज्ञान के मूल सिद्धांतो का विनाश कर डाला ।

☝️ आज यह देश और यह दुनिया आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों से पूरी तरह अपरिचित हो गयी है । इनका वैचारिक स्तर, इनके चिंतन का स्तर, इनके ज्ञान का स्तर गिरा ही नहीं बल्कि उल्टा हो गया ।

👉जो शरीर के लिए हितकर था *उसे बीमारी मान बैठे* और जो अहित कर था *उसे उपचार मान बैठे* 

☝️यही विश्व  मानवता का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है और जब तक इस दुर्भाग्य की अज्ञान की सीमा से मानव का चिंतन बाहर नहीं निकलेगा । आयुर्विज्ञान के सिद्धांतों की और नहीं लौटेगा तब तक संसार की कोई भी अस्पताल, कोई भी डॉक्टर, कोई भी चिकित्सा पद्धति व कोई भी औषधि मानव को स्वास्थ्य प्रदान नहीं कर सकेगी । 

   *याद रखो* 

 ☝️जब भी विश्व मानवता को, संसार के लोगों को रोग मुक्त जीवन की चाह होगी, स्वास्थ्य जीवन की चाह होगी, तो उसे इस मान्यता को बदलना ही पड़ेगा व प्रकृति के इशारों को समझना ही  पड़ेगा ,अपनी गलत मान्यताओं को छोडना ही  पड़ेगा और औषधि और चिकित्सा के वर्तमान ढांचे से अपना मुंह मोडना ही पड़ेगा ।

 तभी उनका कल्याण होगा ।

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