रविवार, 5 अप्रैल 2015

भारतीय ऋषि-कृषि संस्कृति के आयाम

भारतीय ऋषि-कृषि संस्कृति के आयाम
लीना मेहेंदळे
आज मैं अपने पाठकों के सम्मुख प्राचीन भारतकी उस त्रि-आयामी संस्कृति का चित्र रखना चाहती हूँ जो आजकी द्वि-आयामी जीवनशैलीसे भिन्न थी, टिकाऊ विकासकी पक्षधर थी और प्रकृतिसे सामंजस्य बनाकर चलती थी। समृद्धि या विकास में यह सामंजस्य बाधक नही वरन पूरक था या यों समझ ले कि यदि विरोधाभास हुआ तो सामंजस्यकी और पर्यावरणकी प्राथमिकता थी। इस जीवनशैलीमें वन-गमन कोई अप्रिय या अगम्य घटना नही थी बल्कि जीवन-यापनका वह भी एक तरीका था। जैसे लोग ग्राम-निवासी या शहर-निवासी होते थे वैसे ही वह वनवासी भी होते थे। यह वनजीवन हमारी ऋषि-कृषि संस्कृतिका परिचायक एवं अभिन्न अंग था। यहींसे ज्ञानप्रचार, अध्ययन-अध्यापन व शोध-कार्य चलते थे और उनका व्यवहार में उपयोग कर खेती, उद्यम, व्यापार तथा कलाके माध्यमसे समृद्धि का निर्माण होता था।
प्रकृति अर्थात हमारे पहाड, नदियाँ, वृक्ष, जलवायु, खनिज, वनचर, ग्राम-पशु, आदि। इनसे सामंजस्य रखते हुए  व्यक्ति के सम्मुख लक्ष्य थे ज्ञानसाधना, प्रयोगशीलता, उत्पादन, एवं संपन्नता । समाज-व्यवस्था ऐसी थी जिसमें हरेकके लिये वनवास, ग्रामवास, व नगरवासके अवसर थे। आजकी जीवनशैलीमें ग्रामीण व शहर व्यवस्था भी आपसमें कटी कटीसी है जबकि उस व्यवस्थामें वनवास, ग्रामवास और नगरवास तीनोंमें गहरा  तालमेल था। तीनों एक-दूसरेकी आवश्यकताओं की पूर्तिमें सहायक थे। इसलिये वनजीवनभी उतनाही सहज था जितना ग्राम-जीवन।
अध्ययन व अध्यापन के केंद्र प्रायः घने जंगलके अंदर गुरुकुल प्रणालीसे चलते  थे । बाल्यावस्थासे ही शिक्षार्थी गुरुकुलमें रहने लगते थे। शिक्षा-दीक्षा समाप्त करनेपर उनका गार्हस्थ-जीवन प्रायः ग्रामोंमें बीतता था। फिर वानप्रस्थमें फिरसे वनजीवन आरंभ होता और संन्यास आश्रममें वह देशाटन द्वारा समाज-जागृति के लिये समर्पित हो जाता। संन्यासीको लौटना होता था ग्रामों और नगरोंमें -- घूमघूमकर ज्ञानप्रचार के लिये। राजा, राजदरबारी तथा बडे व्यापारी नगरवासी हुआ करते थे। उत्पादनकी पूरी प्रणाली गाँवोंपर निर्भर थी जहाँ केवल खेती ही नही बल्कि अन्य लघु-उद्योग भी चलते थे। इस तरह अधिकांश जनसंख्या के निवास,  उत्पादन एवं चरितार्थ का स्थान गाँव ही थे।
गाँवोंकी भौगोलिक रचना में केंद्र पर ग्रामस्थान है जो निवास के लिये है। इसके चहुँ ओर खेत हैं, उनके आगे चराई के लिये प्रधिकृत जमीन, उसके आगे ग्रामवन अर्थात वह जंगल जो उस गाँवका माना जाता है – अर्थात इस जंगलके तमाम उत्पादोंपर गाँव का उपभोग होगा और इस जंगलके रखरखाव की जिम्मेदारी गाँव की होगी। यह प्रायः अरण्य और चराई के बीच बफर-झोन का काम करता है और इसमें बडे वन्यपशू नही होते। ये प्रायः समतल भी होते हैं।
इसके परे होंगे वे अरण्य जिनपर किसी एक गाँवका अधिकार नही होगा – रखवाली का जिम्मा राजा का होगा। दुर्गम पहाडियाँ, नदियों व झरनों के उगम स्थान, वन्यपशुओंका निवास, साथही कतिपय वनवासी ऋषियोंके गुरुकुल, आश्रम या तपःस्थली यह अरण्योंके परिचायक हैं। अंग्रेज शासनकाल तक यही व्यवस्था रही और गुरुकुलोंका मुद्दा छोडें तो गाँवका भौगोलिक समीकरण आज भी वही है।
गुरुकुल एवं आश्रम जीवन विद्यादान व शोध के संस्थान थे। चाहे राजकुमार हो या एक निर्धन बालक, दोनोंकी पढाई गुरुकुलमें एक साथ और बिना किसी भेदभावके होती थी। इस दौरान उन्हें वनानुकूल जीवनमूल्य सिखाये जाते। अर्थात प्रकृति के साथ एकतानता बनाते हुए पहाड, वन्यजीव, जंगल, नदियाँ बचाने हेतु आवश्यक जीवन पद्धति । अपनी वैयक्तिक आवश्यकताओंको न्यूनतम रखना, उत्पादन के तरीके सीखना, हुनर प्राप्त करना इत्यादि। साथ ही कई प्रकार के शोधकार्य भी गुरुकुलोंमें संपन्न होते थे। विद्यार्थी तो वनोंमें अल्पकाल के लिये ही आते लेकिन अन्य वनवासी चिरकालीन थे जिन्हें अंग्रेजोंने ट्रायबल या आदिवासी का नाम दिया। ये वनवायी एवं वानप्रस्थी  गुरुकुल वासियोंके साथी एवं शोधकार्य में भागीदार होते थे क्योंकि उन्हें जंगलकी गहरी जानकारी होती थी।
ऐसे वनजीवन के लिये आवश्यक नीतिमूल्य थे अपरिग्रह, (प्रकृतिसे न्यूनतम लेना), शांति,  मैत्री, विनामूल्य विद्यादान, प्रयोगशीलता, तप, सत्यवादिता (ज्ञानप्रसार के लिये अनिवार्य), निर्भयता, समता (विद्यादानमें सबसे एक जैसा व्यवहार – उदा. कृष्ण-सुदामा) आदि। देवराई के नामपर ऐसे जंगल छोडे जाते जहाँ से कोई भी कुछ भी नही उठायेगा। आश्रम जीवन का अर्थ था प्रकृति के साथ एकतानता बनाते हुए
पहाड, वन्यजीव, जंगल, नदियाँ  आदि बचाने हेतु आवश्यक जीवन पद्धति।
गुरुकुलोंमें शोधकार्य चलते थे जो अगले उत्पादों में सहायक थे। लेकिन शोधकार्य के लिये उपकरण भी आवश्यक होते हैं और उन्हें बनानेवाला कोई कारीगर ही चाहिये। जो खोजी मनश्चक्षुसे देख पाता है कि गोल आकारवाली वस्तु शायद अधिक तेजीसे चल पायेगी, वह स्वयं लोहेकी एक गोलाकार कडी बना सके ऐसा नही होता। इस प्रकार उन शोधोंके लिये पूरक कारीगर और उत्पादक आवश्यक होते है और परंपरागत रूपमें यह भूमिका ग्रामवासी निभाते थे। शोधकार्य खासकर कृषिसे संबंधित हो तो तुरंत किसानोंको अपने ज्ञानमें शामिल कर बडे पैमानेपर होनेवाले प्रयोग व उत्पादन उनके द्वारा होते थे। इस प्रकार गुरुकुलोंमें चलनेवाले शोध ग्रामजीवन को समृद्ध करते थे और उनसे सहायता भी लेते थे।
वनवासियोंसे हटकर ग्रामवासियोंको देखें तो उनके जीवनमूल्य कृषि संस्कृति से  जुडे थे। अन्नं बहु कुर्यात् तद् व्रतम् । अन्नकी बहुलता बढायें -- यही व्रत रहा क्योंकि एक बीजसे हजारोंकी उत्पत्ति करनेवाला और प्रकृतिका न्यूनतम दोहन करनेवाला एकमेव व्यवसाय कृषि ही है। अन्य आवश्यक नीतिमूल्य थे अस्तेय (अचौर्य), धैर्य, सहयोग, कौशल्य, पशुपालन, कला, कारीगरी। भारत के किसान स्वयं ही अगली फसलके लिये बीज-संग्रह करते थे और एक-दूसरेसे बीजोंका आदान-प्रदान भी करते थे । य़ही कारण है कि भारतमें अन्न सहित हर प्रकारके बीज और पशुधनमें अपरिमेय  रूपसे जैव-विविधता है। अचौर्य का अत्यधिक महत्व है क्योंकि इसके बिना तैयार होनेको आई अपक्व फसलके चोरी होनेकी संभावना बनी रहती है।
नागरी जीवन भी आवश्यकथा क्योंकि राज्यसत्ता के तथा व्यापार के केंद्र नगरोंमें थे। उनके नीतिमूल्योंमें आश्रमों का अनुशासन शिरोधार्य था खासकर जिस आश्रमसे शिक्षा ग्रहण की है। शौर्य, नीतिमानता, दंड-व्यवस्था, न्याय, शुद्ध-व्यापार, कला की परख व प्रोत्साहन आदि अन्य नीतिमानता के प्रमाण थे।
इस प्रकार वनजीवनकी एक सशक्त परंपरा भारतमें रही जिसमें नागरी एवं ग्रामीण इलाकोंसे हर बालकका विद्याग्रहण के लिये वनों में निवास अनायास हो जाता था। वहीं उनका विद्या अध्ययन, व्यवसाय-कौशल्य, जीवनमूल्य, शोध आदि हर प्रकारसे शिक्षा होती थी। वानप्रस्थमें वन-निवास व ज्ञानसाधना के बाद ही वह व्यक्ति संन्यासके उपयुक्त माना जाता था। यह परंपरा अंग्रेज शासनकालसे लुप्त होती गई क्योंकि भारतकी वनसंपदा अंग्रेजों की तिजोरी भरनेके लिये आरक्षितसी हो गई थी।
यह दुर्भाग्यकी बात है कि हमने अपनी वनजीवनकी परंपरा खो दी है। उससे अधिक दुर्भाग्यकी बात होगी जब हम अपनी ग्रामजीवनकी परंपराको भी खो देंगे। यदि हम आजही की गतिसे केंद्रीकृत व्यवसायोंकी ओर जाते रहे और अपनी विकेंद्रीकरणकी परिपाटी को भुला दिया तो वह दिन भी दूर नही होगा। फिर हम एक विविधताहीन उबाऊ शहरी जीवन जीने के लिये बाध्य होंगे। उससे पहले ही हमें फिर एक बार वनजीवनकी परंपराको सशक्त रूपमें स्थापित करना होगा।
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Subodh ji ---------------------------------
वेदोंमें वानप्रस्थ
https://drive.google.com/open?id=0B24oGzK30vfpaExtUHZZd0VTYXM

Dear all,
I express my grateful thanks to dear Arun ji for enlightening us with these important facts about our glorious past. 
I will like to share a little bit on the management of hill areas of India started by the British empire in their self interests.
By their lifestyle inhabitants of these hill areas were found to be very healthy and hardy , and were considered excellent material for recruitments to British Army. This is how famous Gorkha, Kumaon, Garhwal, Dogra, Baloch  regiments were formed. But there was a problem . How to attract these people from their contented hill life to leave their homes and come to join service in the Army?

 The hill people led a very contented simple life that centered around their cows,  sheep goats etc. These animals fed on the ground cover of the vegetation on hill slopes and forests. Women folk took their herd into the forests, lopped the lower branches of fodder trees , while their herd fed on the green ground cover. In the evening the women while returning their herd back , also carried home on their backs a heavy loads of fodder tree branches. Most common fodder leaf tree in Himalayas was बांझ oak family tree. In fact lopping of the lower branches of the trees help sun to reach ground and thus helps in growth of greenery on ground. In fact there is a very clear indication of this phenomenon in Vedas. Today बांझ tree have become extinct from Uttaranchal. In fact an NGO from New Zealand that had imported these trees from India long time back have now offered to come and replant these trees in Himalayas. 
British Forest policy was put in place to forbid entry of any animals into the forests., to starve the hill people and force them to leave their homes and come down and take up jobs in Army or else where. 
 All Banjh trees that provided leaf fodder to the animals were to be replaced with planting of Needle Palm trees. 
This resulted in ground in hill forests to be fully covered with pine needles. By mulching effect no green cover on the ground survived.
 Animal by their entry into forests were able to not only feed themselves on the green ground cover but also with  their dung  kept the earth rich with organic fertilizers. 
Green cover on the hill forests in addition to providing forage for animals also has two very significant functions. This greenery by its root system stabilizes and holds the  top soil firmly  and thus  protects against soil erosion on hillslopes during rains. This prevents landslides and cutting of hill sides when river water levels rise during rainy season. This issue was taken up personally by Mira Behan Gandhiji's British disciple with Prime minister Nehru ji and Morarji Desai , when she faced landslides and floods in Ganga in her work on Pashulok in Solani and Rishikesh. But even the Indian prime ministers could not bring about a change in the Indian Forest Policies.    
Second most important contribution of this green cover is the bacteria 'pseudomonas Syringae'   that is formed in the decaying green leaves on the ground. Modern science   has established that these bacteria rise to cloud heights and have a great role in causing rains. These bacteria lower the ice nucleating temperatures of the clouds .The  clouds do not bypass the hills without shedding their rains. In fact in वृष्टि यज्ञ when performed on the ground, that has these bacteria, the fire propels these bacteria to cloud heights and causes early rains. In fact  वृष्टि यज्ञ Ved mantra requests the Maruts these microbes to bring rain to earth. When there is no green cover on the hills due to mulching by pine needles, these is no rain facilitating bacteria. The clouds regularly bypass the hills and turn them gradually into deserts. 
In fact anybody visiting USA may have noticed a very pink cover on Pennsylvania highway slopes. On enquiry I was told that this was called Pennsylvania Crown Vetch that has pink flowers and is planted on slopes on the sides of highways to hold the soil together and prevent any land slides.  I had personally given a write up on this subject to the secretary of of environment minister Shri Juh dev ji during NDA Govt. In fact there are large number of similar plants that are used to hold e soil firmly to prevent landslides. There are of many other measures taken about containing land slides. In fact a small country like Sri Lanka, their Building Research Institute - (Similar to our CBRI Roorkee)  had done some very good research work on the subject of landslides and that has been adopted even by Germany. But our scientists at Roorkee have never looked beyond their desks. 

The fact of the matter is that in India, we have never considered a holistic approach to our environments at all.
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-ऋषि संस्कृति की अनुपम देन  अग्निहोत्र कृषि 

तारीख: 21 Sep 2015 15:02:27
पर्यावरण शुद्धि व जलवायु नियंत्रण के सिद्धांतों पर आधारित वैदिक कृषि पद्धति हमारी देव संस्कृति के क्रांतिदर्शी ऋषियों के ऐसे उत्कृष्ट चिंतन का परिणाम है जिसका आज भी कोई सानी नहीं है। खेती की वैदिक पद्धति भारत की ऋषि संस्कृति का मानव समुदाय को दिया गया ऐसा अनूठा उपहार है जिसकी उपयोगिता उस युग की तुलना में आज कई गुना अधिक है। प्रयोगों व प्रमाणों की कसौटी पर कस कर इस विधा को आधुनिक कृषि विज्ञानी  भी स्वीकार कर चुके हैं। वैदिकयुगीनँ८ यज्ञ पद्धति पर आधारित अग्निहोत्र कृषि का पूर्ण प्रकट विज्ञान आज हमारे सामने उपलब्ध है।
  अग्निहोत्र कृषि की वैदिक पद्धति को  वर्तमान युग में प्रकाश में लाने का श्रेय जाता है महाराष्ट्र के विख्यात संत स्व. गजानन महाराज को जिन्होंने वेदों का गहन अध्ययन कर मानव समाज के समग्र हित में इस पद्धति को न सिर्फ खोज निकाला वरन् इसका प्रयोग कर अपने क्षेत्र के कृषकों को बड़े पैमाने पर उत्तम कृषि के लिए प्रेरित किया। उनके पश्चात भारत की इस वैदिक विधा का देश-विदेश में सफल प्रचार-प्रसार का श्रेय अन्तरराष्ट्रीय कृषि विज्ञानी वसंत परांजपे को जाता है। रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभावों को देखते हुए देश के प्रगतिशील कृषकों का रुझान पुन: तेजी से कृषि की इस पद्धति की ओर बढ़ रहा है। कारण कि इस पद्धति से उत्पादित फसल गुणवत्ता की दृष्टि से तो बेहतर होती ही है, भूमि की उर्वरा शक्ति भी इससे बरकरार रहती है। साथ ही पर्यावरण को संरक्षित करके इसके द्वारा ईको सिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) का संतुलन भी बरकरार रखा जा सकता है। जैविक कृषि के इन बहुआयामी लाभों को देखते हुए आधुनिक कृषि विज्ञानी इसके प्रचार-प्रसार की ओर विशेष ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। यदि भारत सरकार जैविक कृषि उत्पादों के विपणन की उचित व्यवस्था कर दे तो मेहनत से जी न चुराने वाले कृषि स्नातकों के लिए इसमें उज्ज्वल भविष्य की कई संभावनाएं निहित दिखायी देती हैं।
जैविक कृषि में परम्परागत फसलों जैसे रबी, खरीफ और दलहन की पैदावार के साथ-साथ फलों, साग-सब्जियों, औषधीय पौधों व फूलों की खेती आदि में बेहतर परिणाम सामने आये हैं। कृषि क्षेत्र में नियमित अग्निहोत्र के साथ नेडप कम्पोस्ट (गोबर व जैविक कचरे से बनी खाद) व वर्मी कम्पोस्ट (केंचुआ खाद) के प्रयोग से फसल की गुणवत्ता तो बढ़ती ही है, पैदावार भी अच्छी होती है। हां यह जरूर है कि यह काम श्रम व नियमितता की दरकार रखता है।
देश के विख्यात उद्यान एवं कृषि वैज्ञानिक डा. आरके पाठक के अनुसार नियमित अग्निहोत्र (यज्ञ की विशिष्ट प्रक्रिया) करने से कृषि प्रक्षेत्र व यज्ञ करने वाले व्यक्ति के चारों ओर एक विशिष्ट वातावरण 'औरा' का निर्माण होता है जिसके प्रभाव से आस-पास की नकारात्मक शक्तियां नष्ट हो जाती हैं। इससे मनुष्य व पशुओं दोनों के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और कृषि उर्वरता का अद्भुत विकास होता है। कृषि भूमि में नियमित अग्निहोत्र करने व यज्ञ भस्म का छिड़काव करने से भूमि की उर्वरा शक्ति में गुणात्मक सुधार देखा गया है।
जैविक कृषि और अग्निहोत्र से कृषि व बागवानी की गुणवत्ता बढ़ाने के कई प्रयोग उत्तर प्रदेश के बाराबंकी, उन्नाव, आजमगढ़, जौनपुर, प्रतापगढ़ जिलों के किसानों ने किये और आशातीत लाभ अर्जित किया। इसके अलावा मध्य प्रदेश के खरगौन जिले के बखारा, भागफल, नंदिया, घोनाथ, घोसली, बेगान, गजवादन और महाराष्ट्र में थाणे के शाहपुर, भिवण्डी, वाडा, तालुका के साथ तपोवन (मानस फार्म) के अलावा कर्नाटक के बेलगाम क्षेत्र में भी जैविक कृषि के नतीजे खासे उत्साहवर्धक हैं।
 भारत में जैविक कृषि के सफल प्रयोगों से प्रेरित होकर आस्ट्रेलिया, कनाडा, अस्ट्रिया, पोलैण्ड, जर्मनी, रूस, अमरीका, कम्बोडिया, पेरू, चिली अर्जेन्टीना आदि देशों में भी जैविक कृषि व अग्निहोत्र के द्वारा भूमि व मनुष्य दोनों की सेहत को सुधारने के प्रयास युद्धस्तर पर  शुरू हो चुके हैं।
अग्निहोत्र कृषि का मूल सिद्धांत
अग्निहोत्र कृषि का अभिप्राय अग्नि द्वारा व्यक्ति, कृषि प्रक्षेत्र व वायुमंडल को पवित्र करने की प्रक्रिया से है। इस प्रक्रिया द्वारा वायुमंडल एवं वातावरण में प्रकृति की स्वाभाविक शक्तियों, ज्योतिषीय संयोजनों एवं मंत्र शक्ति से ऐसे परिवर्तन लाने का प्रयास किया जाता है जिससे सूर्य और चन्द्रमा से प्राप्त होने वाली उच्च शक्ति युक्त ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को और अच्छे ढंग से ग्रहण किया जा सके। यह प्रक्रिया पृथ्वी के ऊर्जा चक्र को इस प्रकार नियंत्रित करती है, जिससे यह ऊर्जा प्रकृति के अनुरूप प्राणीमात्र के कल्याण के लिए सकारात्मक दिशा में प्रवाहित होती रहे।
यज्ञाहुति देने की विधि
एक ताम्र पात्र में से अक्षत के कुछ दाने  बायीं हथेली में लेकर गाय के घी की कुछ बूंदें उस पर छिड़ककर अच्छी प्रकार मिलाकर ठीक सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय निर्धारित मंत्रों का उच्चारण करते हुए प्रज्ज्वलित अग्नि में श्रद्धाभाव के साथ दो-दो आहुतियां अर्पित की जाती हैं।
सूर्योदय का मंत्र  
र्योदय का मंत्र
ॐ सूर्याय स्वाहा इदम् सूर्याय इदम् न मम्
(पहली आहुति अर्पित करें)।
ॐ प्रजापतये स्वाहा
इदम् प्रजापतये इदम् न मम्
(दूसरी आहुति अर्पित करें)।
सूर्यास्त का मंत्र
ॐ अग्नये स्वाहा
इदम् अग्नये इदम् न मम्
(पहली आहुति अर्पित करें)।
ॐ प्रजापतये स्वाहा
इदम् प्रजापतये इदम् न मम्
(दूसरी आहुति अर्पित करें)।
अग्निहोत्र के समय बरती जाने वाली सावधानी
इस अग्निहोत्र  में समय की पाबंदी (स्थान विशेष का सूर्योदय तथा सूर्यास्त समय) का विशेष महत्व है।  आहुति देने के बाद लौ बुझने तक शांत चित्त भाव से बैठे रहना चाहिए तथा अग्निहोत्र भस्म को अगले दिन एकत्रित कर मिट्टी के पात्र में एकत्र कर लेना चाहिए।
अग्निहोत्र कृषि के विविध प्रकार
व्याहृति यज्ञ
यह अग्निहोत्र की तरह नित्य नहीं बल्कि नैमित्तिक यज्ञ है। हर कृषि सम्बन्धी कार्य के पूर्व व पश्चात इसे करना चाहिए।  अग्निहोत्र पात्र के निकट उसी प्रकार के दूसरे पात्र में व्याहृति होम करने के लिए गाय के गोबर के कण्डे जलाएं। इस हवन के लिए निर्धारित चार वेद मंत्र इस प्रकार है-
ॐ भू: स्वाहा, अग्नये इदम न मम।
ॐ भुव: स्वाहा, वायवे इदम न मम
ॐस्व: स्वाहा, सूर्याय इदम् न मम्।
ॐ भू भुव: स्व: स्वाहा,
प्रजापतये इदम् न मम।
प्रत्येक मन्त्र बोलते समय स्वाहा के उच्चारण पर सिर्फ एक बूंद गाय का घी अग्नि में अर्पित किया जाय। इस यज्ञ में चार बूंद गाय के घी के अलावा अन्य किसी भी पदार्थ की आहुति नहीं दी जाती। भू:, भुव:, स्व: इन तीनों शब्दों का आशय क्रमश: भूमण्डल, वायुमण्डल और आकाश हैं। अन्त में चौथी आहुति इन तीनों व्याहृतियों का उच्चारण एक साथ करके जो अग्नि, वायु और सूर्य के जनक हैं, उन प्रजापति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने को दी जाती है।  होम किये गये घी के जलकर वायुरूप होने तक यथास्थान बैठे रहना चाहिये। यज्ञ पात्र शीतल होने के पश्चात अग्निहोत्र के पात्र को उठाकर उचित स्थान पर रख देना चाहिए।
त्र्यम्बकम् यज्ञ
अग्निहोत्र कृषि में संधिकालों का अत्यधिक महत्व है। जिस तरह सूर्योदय-सूर्यास्त के संधिकालों में नियमित अग्निहोत्र किया जाता है, उसी तरह पाक्षिक संधिकालों अर्थात् अमावस्या-पूर्णिमा को भी विशिष्ट यज्ञ किया जाता है। इसे  त्र्यम्बकमयज्ञ कहते हैं। इसका मंत्र इस प्रकार है-
ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्द्धनम्।
उर्वाकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् स्वाहा।
इस मंत्र के उच्चारण के साथ स्वाहा बोलने के साथ प्रज्वलित अग्नि में सिर्फ एक बूंद गाय का घी अर्पित किया जाता है। चार लोग एक घण्टा देकर यह यज्ञ कर सकते हैं। चार लोगों के एक घण्टे के यज्ञ के लिए 200 ग्राम घी पर्याप्त है।  यह यज्ञ खेत में ही करना चाहिए। इस यज्ञ के लिए ईंटों से जमीन में चौकोर पात्र भी बनाया जा सकता है। पात्र में राख अधिक होने पर उसे निकालते रहना चाहिये और नये कण्डे लगाकर अग्नि लगातार इतनी प्रज्ज्वलित रखनी चाहिये कि एक बूंद घृत की आहुति से लौ निकलती रहे।
यह यज्ञ कृषि भूमि से प्रदूषण कारक हानिकारक तत्वों व रोगाणुओं को प्रतिबंधित करता है। त्र्यम्बकम् यज्ञ की शुरुआत व समापन व्याहृति होम से ही किया जाना चाहिए। यदि अमावस्या-पूर्णिमा को यज्ञ न कर सकें तो खेती में बोनी, कटनी आदि कृषि कार्यों  के दौरान इसे करना फसल के लिए काफी लाभदायी होता है। नित्य अग्निहोत्र और समय-समय पर ये दो नैमित्तिक यज्ञ और इनकी भस्म का उपयोग, यह देश की प्राचीन कृषि पद्धति का मूल आधार है।
सुविख्यात कृषि विज्ञानी श्री वसंत परांजपे ने जर्मनी तथा पोलैण्ड के कुछ वैज्ञानिकों के साथ कृषि प्रक्षेत्र पर प्रतिध्वनि ऊर्जा से अतिसूक्ष्म (विलक्षण ऊर्जा) के उत्सर्जन एवं उपयोग का मानकीकरण किया है। 
इस प्रयोग में कृषि प्रक्षेत्र के मघ्य अग्निहोत्र के लिए  फूस की कुटी बनाकर प्रतिध्वनि स्थल की स्थापना को नियत संख्या में ताम्रपात्रों को विशेष मंत्रोचरण द्वारा ऊर्जावान कर उपयोग किया जाता है। इस झोपड़ीनुमा छतरी के मध्य निर्धारित गहराई का गड्ढा खोदकर उसमें एक ताम्रपात्र को स्थापित कर, ठीक उसके ऊपर अग्निहोत्र करने वाले व्यक्ति के हृदय चक्र तक की निर्धारित ऊंचाई तक इंर्ट की चिनाई कर उस पर एक ताम्रपात्र रखा जाता है। इसके सामने ठीक पूर्व, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण दिशा में प्रतिध्वनि स्थल स्थापित किये जाते हैं। प्रक्षेत्र छोटा होने पर बाहरी किनारे पर इनका स्थापन किया जा सकता है। सूर्योदय व सूर्यास्त के अग्निहोत्र विशेष रूप से स्थापित किये गये इन केन्द्रों में करने पर विशेषरूप से फलदायी देखे गये हैं। प्रयोगों में पाया गया है कि  नियमित अग्निहोत्र से कृषि प्रक्षेत्र पर उगायी जा रही फसलें, पशु तथा निवास कर रहे व्यक्ति के स्वास्थ्य में सुधार, स्थान विशेष में प्रदूषण की कमी, फसल उत्पादन में आशातीत बढ़ोत्तरी तथा खरपतवार तथा हानिकारक कीटों एवं व्याधियों का संक्रमण  कम होता जाता है। साथ ही अग्निहोत्र के ताम्रपात्र में जलती हुई अग्नि एवं मंत्रोच्चारण से उत्पन्न प्रतिध्वनि से वातावरण पर ऐसा प्रभाव पड़ता है जिससे कि पौधों की कोशिकाओं, मानव एवं प्राणिमात्र को नयी जीवनीशक्ति मिलती है। साथ ही अग्निहोत्र की भस्म (राख) का प्रयोग कीटनाशक व फसल के ऊतक संकुचन प्रभावों को उत्पन्न करने में कारगर होता है। फार्म प्रक्षेत्र पर यदि किसी कारणवश नियमित रूप से अग्निहोत्र न हो सके तो एक किग्रा यज्ञ भस्म का छिड़काव प्रति एकड़़ भूमि पर किया जा सकता है। भस्म का प्रयोग अनाज तथा दलहनों के भण्डारण हेतु भी किया जा सकता है।
कीटनाशकों का निर्माण व उपयोग विधि
यज्ञ भस्म व गोमूत्र को निर्धारित अनुपात में मिलाकर 25 दिनों तक फर्मन्टेशन (खमीर उठने) के लिए रखें। तत्पश्चात इस मिश्रण को पानी में (1:4 के अनुपात में) मिलाकर बीज/पौध उपचार या रोग/कीट प्रबंधन के लिए  तीन दिनों तक प्रात: एवं सायंकाल अच्छी प्रकार मिलाते हुए निथार कर फसल में छिड़काव करें। उपरोक्त घोल को छिड़काव पूर्व दस मिनट तक घड़ी की सुई की दिशा तथा विपरीत दिशा में भंवर बनाकर मिलाने से प्रभाव में गुणात्मक असर पड़ता है। जैविक कीटनाशक (होमा बायोसोल) का अनुभूत प्रयोग 200 लीटर क्षमता वाले टैंक भर जैविक कीटनाशक होमा बायोसोल  बनाने के लिए  आवश्यक सामग्री -2 किग्रा. यज्ञ भस्म,  20 किग्रा गाय का ताजा गोबर, 10 किग्रा. केंचुए की खाद, 130 किग्रा.  कार्बनिक अवशेष, 80 लीटर अग्निहोत्र भस्म मिश्रित जल व श्री यंत्र ।
विधि : 200 लीटर क्षमता वाले टैंक में श्री यंत्र स्थापित कर उसमें ऊपर से ताजे गोबर को डाल दें, अग्निहोत्र की राख ऊपर से छिड़क दें, तत्पश्चात केंचुआ खाद व कार्बनिक अवशेष डाल दें। उपरोक्त प्रक्रिया दो या तीन बार अपनाएं एवं गाय के ताजे गोबर की ऊपरी परत पर बिछायें। इस घोल में से सात दिन के बाद टेैंक से गैस निकलनी शुरु हो जाती है, जिसको पात्र में एकत्रित करके गोबर गैस ईंधन के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। साथ ही दो सप्ताह बाद गाढ़े तरल खाद को प्राप्त किया जा सकता है। इस होम बायोसाल का प्रयोग प्राय: सूर्यास्त के पश्चात त्र्यम्बकम् मन्त्र के साथ करना विशेष रूप से लाभदायी होता है। अपनी जमीन, सेहत और पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति विशेष रूप से फिक्रमंद व जागरूक लोग जैविक कृषि व होमा फार्मिंग को बतौर करियर अपनाकर उज्ज्वल भविष्य की राह प्रशस्त कर सकते हैं।
 (आलेख केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान में
कृषि वैज्ञानिक डा. रामकृपाल पाठक के नेतृत्व
में हुए शोध-अध्ययन   आधारित)
1़    विशिष्ट आकार(पिरामिड) का ताम्र अथवा मिट्टी का पात्र।
2़    गाय के गोबर से बनाये गये पतले उपले।
3़    देशी गाय का घी।
4    ज़ैविक पद्घति द्वारा उत्पादित बिना पॉलिश का अक्षत (बिना टूटा चावल)।
ताम्र पिरामिड
अपनी विशिष्ट आकृति के कारण ताम्र पिरामिड विभिन्न प्रकार की ऊर्जा को ग्रहण करने की अद्भुत क्षमता रखता है। यह पिरामिड टरबाइन का कार्य करता है। सूयार्ेदय के समय जो विशिष्ट ऊर्जाएं प्रज्ज्वलित ताम्रपात्र में एकत्रित होती हैं वे आहुति तथा मन्त्रोच्चारण के साथ प्रबलतम होकर आकाश में 12 किमी. ऊंचाई तक फैल जाती हैं। सूर्यास्त के समय ये ऊर्जाएं इस विशिष्ट आकृति से विलग होकर आकाश में समाहित हो जाती हैं।
अक्षत (बिना टूटे चावल)
पालिश करने से चावल के पोषकीय गुणों का हृास होता है। अत: चावल के वही दाने प्रयोग करने चाहिए जो कि टूटे न हों।  यदि जैविक विधा द्वारा उत्पादित तथा गांव में मूसल उर्वारुक द्वारा निकाला गया चावल उपलब्ध हो सके तो उत्तम रहेगा।
गाय का घी
अग्निहोत्र में प्रयोग के समय देशी गाय का घी अदृश्य ऊर्जाओं के वाहक के रूप में काम करता है एवं शक्तिशाली ऊर्जा इसमें बंध जाती है। चावल के साथ दहन के समय इससे आक्सीजन, इथोलीन आक्साइड, प्रोपाइलीन आक्साइड एवं फार्मेल्डिहाइड गैसें उत्पन्न होती हैं। फार्मेल्डिहाइड जीवाणुओं के खिलाफ प्रतिरोधी शक्ति प्रदान करती है व प्रोपाइलीन आक्साइड वर्षा का कारण बनती है।
गाय के गोबर से बने शुष्क उपले (कण्डे)
गाय के ताजे गोबर से पतले उपले बनाकर धूप में सुखा लिए जाए। अग्निहोत्र की आग इन्हीं सूखे उपलों से तैयार की जाए। गाय के गोबर में एक्टिनोमाइसिटीज नामक सूक्ष्म जीव काफी मात्रा में पाये जाते हैं। भारत एवं अन्य देशों जैसे अमरीका, यूरोप एवं एशिया के विभिन्न देशों में गाय के गोबर लेपन से रेडियोधर्मिता कम करने के प्रयोग के उल्लेख मिलते हैं।
अग्निहोत्र की अग्नि प्रज्ज्वलित करने की विधि
ताम्र पिरामिड में सर्वप्रथम एक चपटे आकार के उपले का टुकड़ा केन्द्र में रखते हैं। उसके ऊपर उपलों के टुकड़ों को इस प्रकार रखा जाता है जिससे पात्र के मध्य वायु का आवागमन सुचारु रूप से हो सके। उपले के एक टुकड़े में गाय का थोड़ा घी लगाकर अथवा घी चुपड़ी रुई की बत्ती की सहायता से अग्नि को प्रज्ज्वलित किया जाता है। शीघ्र ही रखे हुए अन्य उपले भी आग पकड़ लंेगे। आवश्यकता पड़ने पर हस्तचालित पंखे का प्रयोग अग्निदाह करने के लिए किया जा सकता है।
 घी के स्थान पर अन्य किसी भी प्रकार के तेल का प्रयोग करने व मुंह से फूंककर अग्नि प्रज्ज्वलित करने की मनाही है।
--- पूनम नेगी 






शनिवार, 29 नवंबर 2014

नरेंद्र भट -- वडील वैद्य सोमेश्वर भट बाबत

नरेंद्र भट  -- वडील  वैद्य सोमेश्वर भट बाबत

रविवार, 19 अक्टूबर 2014

आरोग्य नीति-- आरोग्य भारती के लिये


आरोग्य नीति

1. व्यक्ति
स्वास्थ्य रक्षा- योग व्यायाम.
बिमारी का प्रबधर्म (क्या करें, क्या न करें).
आहार- विहार.
आचार- विचार.
जीवन- दर्शन.
स्वाध्याय.
अध्यापन
सहभाग- यथा लेखन
घरेलू उपाय.
दैनंदिन आदनें.
दिनचर्चा- ऋतुचर्चा.
विभिन्न pathy का विचार.

2.परिवार
दाम्पन्य जीवन- आनंद, सहभाग, सहयोग, अधिकार.
संतती- विचार, गर्भसंस्कार. (अभिमन्यु प्रयोग).
विहार- छुटियाँ- स्वास्थ्य प्रबंचन में.
विचार- बालक, वृध्द, स्त्रियाँ, युवा.
विस्नारित परिवार संबंध वंशावली ज्ञान.

3.गांव- शहर
आपका स्वास्थ्य- आपका  भौगोलिक परिवेश- क्या है संबंध- लेन- देन, व्यापार. जीवन- निर्वाह.
स्वास्थ्य के assets कृषि, गो, वृक्षसंपदा.
पर्यावरण- जंगल, पर्वत
पानी के स्त्रोत
उहाम- इकाइयाँ.
कचरा- स्वच्छता
प्रदूषण
लोककला- लोकज्ञान (वैदू)
Tribal Knowledge.
रुहियाँ.

4.समाज व संस्थाएँ
स्कूल-लाइब्रेरी, स्वच्छता, सुरक्षा.
कला- क्रीडा.
कोर्स की रचना- शिक्षक.
अभ्युदय- संतोष- कौशल रोजगार.
आयुर्वेद
इंदस्ट्रियल हेल्थ- हझार्ड लेखन.


5.राष्ट्र
आरोग्य नीति- कृषि, जल, प्राकृतिक संपदा- दोहन.
पहाड-वन-वृक्ष- मिट्टी- जल स्त्रोत कीटे आरोग्य- रक्षा में भूमिका- पर्यावरण नीति 
शिक्षा- कला- क्रिडा
संस्कृत ग्रंथ संपदा
पाठ्यक्रम + पूरक पाठ्यक्रम.
संस्कृति- भाषानीति.

लेखन- TV-
उद्यम नीति
युवा- विचार- युवा- स्पंदन
मनोवृत्ति में- आरोग्य परिवार.
स्त्रियाँ- सामाजिक स्वास्थ्य- दहेज, अपराध.
Public Health Systems- Communicable diseases.
स्वास्थ्य- सांख्यिकी 
Non- Communicable Disease- Life- Style Management.
Non- Communication- TV/Mobile.

परराष्ट्र 
Farmacy Companies.
Spreading संस्कृत, योग, आयुर्वेद.
IPR- WHO- MACRO- LEVEL
आयुर्वेद,+ पशु- आयुर्वेद- +वृक्ष आयुर्वेद.
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रविवार, 5 अक्टूबर 2014

गव्य-चिकित्सा संवादशाला के लिये दर्शिका -- मुंबई दि 30-06-2013

प्रकृति
पहाड, नदियाँ, वृक्ष,जलवायु, खनिज
वनचर, ग्राम-पशु, मनुष्य
ज्ञानसाधना, प्रयोगशीलता,उत्पादन, संपन्नता
समाज-व्यवस्था – वनवास,ग्रामवास, नगरवास
भौगोलिक व्यवस्था
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ग्राम-रचना
भारतीय समाज-व्यवस्था का केंद्र है गाँव। अधिकांश जनसंख्या के निवास, उत्पादन एवं चरितार्थ का स्थान
गाँवोंकी भौगोलिक रचना में केंद्र पर ग्रामस्थान है जो निवासके लिये है। इसके चहुँ ओर खेत हैं, उनके आगे चराई के लिये प्रधिकृत जमीन, उसकेआगे  वह जंगल जो उस गाँवका माना जाता है–       अर्थात इस जंगलके तमाम उत्पादोंपरगाँव का उपभोग होगा और इस जंगलके रखरखाव की जिम्मेदारी गाँव की होगी। यह प्रायःअरण्य और चराई के बीच बफर-झोन का काम करता है और इसमें बडे वन्यपशू नही होते। ये प्रायः समतल भी होते हैं।
इसके परे होंगे वे अरण्य जिनपर किसी एक गाँवका अधिकार नहीहोगा – रखवाली का जिम्मा राजा का होगा। दुर्गम पहाडियाँ, नदियों व झरनों के उगमस्थान, वन्यपशुओंका निवास, साथही कतिपय वनवासी ऋषियोंके गुरुकुल, आश्रम यातपःस्थली।
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आश्रम जीवन
अर्थात शोध व विद्यादानके संस्थान
 वनवासी --  ये थे गुरुकुल वासियोंके साथी
ग्रामवासी – ये थे उनशोधोंके पूरक कारीगर और उत्पादक
नगरवासी – ये थे राज्यकर्ता  (व्यवस्था-रक्षक) या व्यापारी
वन- विद्याके केंद्र
हरेक को वनमें लौटना है।वन- विद्याके केंद्र हरेक को वनमें लौटना है।
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आश्रम जीवन
प्रकृति के साथ एकतानताबनाये हुए
पहाड, वन्यजीव, जंगल,नदियाँ – बचाने हेतु आवश्यक जीवन पद्धति
 आवश्यक नीतिमूल्य -अपरिग्रह, शांति, मैत्री, विनामूल्य विद्यादान, प्रयोगशीलता, तप, सत्यवादिता(ज्ञानप्रसार के लिये अनिवार्य), निर्भयता, समता (विद्यादानमें सबसे एक जैसाव्यवहार – उदा. कृष्ण-सुदामा)
देवराई ऐसे जंगल जहाँ से कोई भीकुछ भी नही उठायेगा
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ग्राम-जीवन
कृषि संस्कृति – अन्नंबहु कुर्यात् तद् व्रतम् ।
एक बीजसे हजारोंकी उत्पत्ति करनेवाला एकमेव व्यवसाय
आवश्यक नीतिमूल्य –अस्तेय (अचौर्य), धैर्य, सहयोग, कौशल्य, पशुपालन, कला, कारीगरी, 
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नागरी जीवन
राज्यसत्ता का केंद्र,व्यापार – केंद्र,
आवश्यक नीतिमूल्य –आश्रमों का अनुशासन शिरोधार्य, शौर्य, नीतिमानता, दंड-व्यवस्था, न्याय, शुद्ध-व्यापार, कला की परख   व कलाको प्रोत्साहन,
वनजीवनकी की ओर वापसी - नागरी एवं ग्रामीणइलाकोंसे हर बालकका विद्याग्रहण के लिये वनों में निवास
वानप्रस्थमें वन-निवास व ज्ञानसाधना -- फिर संन्यास 
संन्यासीको लौटना है ग्रामों और नगरोंमें -- घूमघूमकर ज्ञानप्रचार के लिये
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यह सारा विवेचन आजकी संवादशालासे कैसे संबंधित है
गव्य चिकित्साका सूत्र है कि मनुष्यके सारे रोगोंका निराकरण पंचगाव्योंसे होता है – दूध, दही,  घृत,गोमूत्र व गोबर ।
ऐसी चिकित्सामें गायके स्वास्थ्यका विचार अवश्यंभावी है
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आयुर्वेदके अनुसार गव्योंके लाभ की 4 शर्ते हैं 
कि गाय जंगलमें चरनेवालीहो ताकि उसके खाद्यान्न में हर प्रकारकी वनस्पतियाँ हों – खूँटेसे बाँधकर रखी गाय अप्रभावी है
आजकी धवलक्रांतिमें गायको एक मशीन माना जाता है -- चेतन     प्राणी नही । अतः सलाह होती है कि गायको कमसे कम व्यायाम दो ताकि उसकी ऊर्जा केवल दूध बनानेमें लगे। यह गव्य चिकित्सा दृष्टिसे अलग है।
दूसरी शर्त – कि बछडा या बाछी गायका दूध पीकर पूर्णतया तृप्त हो तभी गायका दूध मनुष्य के लिये लिया जा सकता है।
तीसरी शर्त कि गायको सर्वदा यह संज्ञान हो कि वह आपके परिवारकी सदस्य है।
चौथी शर्त – गायका खाना कितना विशुद्ध या फिर पोल्यूटेड  है।
और अब तो विदेशी नस्लोंसे बननेवाली प्रजातियोंके दूधके प्रोटीन पर भी प्रश्नचिह्न है। फिर ऐसी गायों के गव्य से चिकित्सा कैसे हो सकती है।
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तो आजके विवेचन का सारांश इतना ही है कि गव्य-चिकित्सा की विधी कारगर होनेकी आवश्यक शर्त है कि हम अपने वनोंके पुनरुत्थानपर ध्यान हैं।
देशमें केवल 13 प्रतिशत भूभाग वनाच्छादित है जो कि 33 प्रतिशत होना चाहिये। 
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समग्र नीति के लिये
वनसंपदा का संवर्द्धन
गोपालनकी सरकारी नीतियोंमें सुधार
शोध प्रक्रिया में जुट जाना
दूध व्यवसाय में घुसी आरोग्य-विघातक प्रवृत्तियों पर अंकुश
देशी गोवंशके माध्यम से गायोंकी वस्ल में सुधार 
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RV1.4 Bounties from a cowगौपालन से उपलब्धियां
 मधुच्छन्दा वैश्वामित्र:  इन्द्र:   गायत्री 
Creates a civilized society
सभ्य समाज  बनता है

1.सुरूप कृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे  जुहूमसि द्यविद्यवि ।।1.4.1
Daily efforts in service of good milk giving cows bless us with beautiful bounties.
 प्रति दिन प्रचुर दुग्ध प्रदान करने वाली गौवों की सेवा  से सुन्दर समाज का विकास
 होता है।


Cows are knowledge enhancers   
गौ  बुद्धि बढ़ाती है
       2. उप नः सवनागहि सोमस्य सोमपाः पिब । गोदा इद्रेवतोमदः ।। ऋ 1.4.2
Cows give our vision to make knowledge creating hubs that increase our knowledge resource, makes us more enterprising to be more prosperous and happy.
           गौवों से दिव्य चक्षु मिलते हैंगौ पालन से  पुरुषार्थी स्वभाव  बनता हैजो सुख और संपन्नता लाता है 
Facilitates Meditation
परमेश्वर का साक्षात्कार होता है
3. अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम्  मा नो अति ख्य गहि ।। 1.4.3
Makes us hear the voice of our conscience in Meditation
ध्यानवस्था में हर विषय पर सुमति हमारे हृदय में अंतरमन में ही मिलती है. हम अपने अंतर्मन की सुमति का कभी तिरस्कार न करें.
Best Counsel
4.परेहि विग्रमस्तृतमिन्द्रं पृच्छा विपश्चितम्  यस्ते सखिभ्य वरम् ।। 1.4.4
May we learn to never ignore the voice of our conscience
हमारी अंतर आत्मा की आवाज़ ही सब से अधिक हितकारी सलाह सिद्ध  होती है.
Enables good articulation

5.उत ब्रुवन्तु नो निदो निरन्यतश्चिदारत  दधानेन्द्र इद दुव: ।।1.4.5
Our speech becomes sweeter and civil
वाणी सदैव उत्तम भद्र बोलें कभी भी अभद्र निंदात्मक अपशब्द न बोलें
Peace loving temperament

6. उत नो सुभगाँ अरिर्वोचेयुर्दस्म कृष्टय:  स्यामेदिन्द्रस्य शर्मणि।। 1.4.6
A change is brought about in our temperament to earn our living by hard work and fair means. Our prosperity and conduct forces even our enemies to be envious.
हमारा उत्तम श्रमशील जीवन यापन द्वारा प्राप्त सौभग्य समृद्धि तथा भद्र व्यवहार हमारे शत्रुओं को भी हमारी प्रशंसा करने के लिए बाध्य करें.
Makes us Virile & Productive
7. एमाशुमाशवे भर यज्ञश्रियं नृमादनम्  पतयन् मन्दयत्सखम् 1.4.7
Virility is established in our physical body and temperaments to bring forth good progeny and be good achievers in life.
वीर्य वृद्धि से पौरुष द्वारा उत्तम संतान और सोम वृद्धि से  जीवन मे उन्नति समृद्धि प्राप्त कराती है.
Removes obstacles to prosperity

अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभव:  प्रावो वाजेषु वाजिनम्।। 1.4.8
Our ability is strengthened to perform thousands of tasks to beat all obstacles in the path of our prosperity.
उत्पन्न सोम द्वारा विजय श्री प्राप्त करने के लिए हम शतक्रतु – सेंकड़ों शुभ कार्य करने वाले बनते हैं .
All round Prosperity


तं त्वा वाजेषु वाजिनं वाजयाम: शतक्रतो  धनानामिन्द्र सातये ।।1.4.9
 Cow develops the inventive temperament to accomplish innumerable techniques required for improving daily life.
(शतक्रतोअसंख्य वस्तुओं के विज्ञान को रखने वाले (धनानाम्‌) पूर्ण विद्या और सामर्थ्य को सिद्ध करने वाले पदार्थों का (सातये) अच्छे प्रकार सुख भोग करने के लिए (वाजेषु वाजिनम्‌) प्राप्त करने में समर्थ (त्वा वाजयाम:) नित्य प्रति जानने और प्राप्त करने के प्रयत्न करते हैं.
Cows provide Divine Blessings
प्रभु कृपा रहती है  

यो रायो3वनिर्महान्त् सुपार: सुन्वत: सखा  तस्मा इन्द्राय गायत।। 1.4.10
Makes possible divine blessings by friendly role of the Almighty/
जो असंख्य धनधान्य से समृद्धि देने वाला परमेश्वर है वह एक सखा के रूप में ( गोसेवक के ) साथ रहता है, उसी का गुणगान सब करते हैं.

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

लोकसंस्कृतिबाबत

लोकसंस्कृतिबाबत

Sandhya Soman -- फेसबुकवर

दहीहंडीवर त्यांचे ठणठणून आणि आपले तणतणून झाले नुकतेच.
पण महाराष्ट्रात, विशेषतः मुंबई-कोकण भागामध्ये हा दहीहंडीचा उत्सव आला कुठून?
तर 'आभीरायण' ह्या पुस्तकानुसार त्रैकूटकांच्या भागवत धर्माच्या श्रद्धेतून हा उगम संभवतो.
आता हे त्रैकूटक कोण? 
नाशिकच्या आभीर साम्राज्याचा अंत साधारण इ.स. ४१४ च्या आसपास झाला. त्यांचाच नातेवाईक आणि मांडलिक किंवा प्रांताधिकारी असलेला इंद्रदत्त. हा त्रैकूटकांच्या या घराण्याचा मूळ पुरुष.(इ.स. ४१४ ते ४४०)
अनिरुध्दपूर हे त्रैकूटकांच्या राजधानीचे ठिकाण. हे म्हणजे आत्ताची आपली अंधेरी म्हणे.
त्रैकूटक राजे स्वतःला सामर्थ्यवान असे अपरांताचे स्वामी मानतात. अपरांतातील दुर्ग, नगरे आणि समुद्र यांचे ते संरक्षक आहेत असे सांगतात.
हा पहिला इंद्रदत्त त्याच्या नृत्यसंगीताच्या आवडीने कोकणच्या जनमानसात,लोकगीतात स्थान मिळवून आहे असे लेखक गंगाधर पारोळेकर म्हणतात.
'आंबा पिकतो..रस गळतो..कोकणचा राजा झिम्मा खेळतो" यातील कोकणाचा राजा म्हणजेच हा इंद्रदत्त. आभीर पार आधीपासूनच आपला आनंद नृत्यातून प्रकट करत असत. हा राजाही असा लोकगीतात रस भरून गेला.
मला आनंद हा की ह्या झिम्म्याच्या गाण्याचा उगम मिळाला.
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मेधा वाडदेकर -- फेसबुकवर

श्रावण महिना सुरु आहे, श्रावणातल्या पारंपारिक पद्धती पैकी एक म्हणजे, सवाष्णीना आणि मुलं बाळं असलेल्या सवाष्णीना (उदा. मंगळागौरी, शुक्रवाराच्या जीवन्तीची पूजा इ. ) बोलावणे... ह्या सगळ्या पद्धती लहानपणापासून बघितल्या आहेत आणि माहिती झाल्या आहेत.. पण खरं सांगायचं तर कधीही विचार नाही केला त्यावर.. आता अचानक विचार आला आणि.... 
सवाष्ण जेवायला घालायचं तर्कशास्त्र काही केल्या कळत नाहीये. पारंपरिक चौकटीत राहून विचार केला तर एक सवाष्ण- जिचा पालनपोषण करणारा नवरा जिवंत आहे,तिला जेवायला बोलावून ‘पुण्य’ मिळविण्याचा हा उफराटा प्रकार कुठला? त्यापेक्षा नवऱ्यामागे हिमतीने जगून मुलांना वाढविणाऱ्या एकाकी विधवेला मान देऊनही पुण्य मिळवता येणार नाही का? आणि विधवाच कशाला, एकाकी जीवन जगणाऱ्या परित्यक्ता, प्रौढ अविवाहिता किंवा घटस्फोटिता यांना यात सहभागी करून घेतलं, त्यांची सुखदु:खं जाणून घेतली, तर चालण्यासारखं नाही का? मुळात स्त्रीच्या वैवाहिक स्थितीनुसार तिची ‘प्रत’ ठरविण्याचा अट्टहास आता कालबाह्य झालाय असं कुणालाच वाटत नाहीये का? ती सधवा आहे की विधवा आहे, की अविवाहित आहे, यापलीकडे जाऊन- ती माणूस म्हणून कशी आहे, याला काही महत्त्वच नाही का? हेकेखोर, मत्सरी आणि वाईट मनाच्या (पण मुलंबाळं असलेल्या) सवाष्णीला मान देऊन पुण्य मिळतं; आणि मनानं चांगल्या असलेल्या, पण या वर्गात न बसणाऱ्या स्त्रीला यात सहभागी करून घेतलं तर पुण्य जोडलं जात नाही, हा विचार अवास्तव नाही का?
मेधा आपल्या समाजात विधवा किंवा एकाकी पडलेल्या स्त्रियांसाठी कोणतीही सामाजिक सपोर्ट सिस्टम नसणे ही चूकच. ती निर्माण करण्याचा प्रयत्नही मोठ्या प्रमाणात केला जातो परंतु तो चिरंतन ठरलेला नाही तर त्यावर अजून जास्त विचारपूर्वक प्रयत्न झाले पाहिजेत. मात्र वरील सवाष्ण पद्धतीचा एक फायदा असावा असे मला वाटते. आपल्याकडे आयुर्वादाच्या ज्ञानाचे अतीव विकेंद्रीकरण करण्याची पद्धत होती व माझ्या मते त्यामुळेच तो इतका टिकला. ज्ञानाचे छोट्या छोट्या प्रमाणांत विभाजन करायचे आणि तेवढा वाटा जतन करण्यासाठी कोणाकडे तरी सोपवून द्यायचा. नवीन लग्न झालेल्या मुलीने मुले-बाळे असलेल्या स्त्रीचे अनुभव जाणून घेण्याची ती एक सुयोग्य व्यवस्था होती कदाचित. प्रत्येक गोष्टीचे जस्टिफिकेशन करायचेच असा माझा विचार नाही. उलट खोलवर विचार करून त्यातले ज्ञान समजून घेण्यात आपली आजची पिढी मागे पडू नये हा तो विचार आहे कारण तसे झाले तर आपला ज्ञानाचा साठा व झरा आटेल ज्याची आज जगासमोर आपल्याला गरज आहे. तो असा काळ होता जेंव्हा ऑबस्ट्रेटिक्स आणि गायनॉकॉलॉजी कॉलेज मधे शिकण्याची परंपरा नव्हती. अशा वेळी नवीन लग्नाच्या मुलीला थोडके पण अत्यावश्यक ज्ञान मिळण्याची ती एक चांगली संधि असू शकते. थोडा हा ही विचार करू या, कारण तुमचा सामाजिक विचार करण्याचा मंच आहे. आयुर्वेदाचे थोडे थोडे ज्ञान आजीच्या बटव्याच्या रुपाने स्त्रीकडे असणे हा तिच्या एमपॉवरमेंटचा एक मोठा स्रोत होता असे मला वाटते. कदाचित तुमचा मंच या विषयावर एखादी वक्तृत्व स्पर्धा घेऊ शकेल.

रविवार, 6 जुलाई 2014

PROJECT ANANTHA -biodiversity

Madan Thangavelu madan.thangavelu2@gmail.com
ja_yaar@yahoo.com, 
Jayant Singh ,
 ajay sahai ,
 K C Supekar


PROJECT ANANTHA OF THE GOVERNMENT IS A NEW NAME OF DISTRICT ECONOMIC
AND ENVIRONMENT DEVELOPMENT (DEED) PLAN WHICH WAS DEVISED AND
RECOMMENDED FOR IMPLEMENTATION IN JHAJJAR DISTRICT WAY BACK IN 2010

It is important to define how the conservation and/or development
efforts for protection of rich agri-biodiversity of different locales
of the the world is to be achieved. District Economic and Environment
Development (DEED) Plan was mooted as a model for that to Planning
Commission of India by Dr Jagveer Rawat in May, 2010, which was
recomended for implementation to the Chief Secretary of Hrayana on
June1, 2010 itself. This Model has given rise to PROJECT ANANTHA as it
is now being tried in ANANTHPUR district of Andhra Pradesh as the
state government of Haryana did not respond despite clearly expressed
will of the Planning Commission to implement the Model with all funds
as a pilot in Jhajjar district of the state which incidentally falls
in Lok Sabha Constituency of son of the Chief Minister. DEED Plan may
be applicable for example how primary producers of Haryana could have
benefitted if it would have utilised tools of Rice Genome for devising
tools of identification of genuine Basmati varieties as well as
similar tools of testing consignments of Indian Basmati from
biological and chemical impurities? Such things are required now by
Basmati Commodity Group (BCG) to strengthen the position of primary
producers of Basmati varieties. It is to be mentioned that The
Federation of Indian Chamber of Agriculture, Trade and Services
(FICATS) is working to launch important commodity groups in forms of
Commodity Councils under the aegis of FICATS, which would have its
branches at State and District levels, namely, State Primary
Producers' Institute (SPPI) and District Primary Producers' Institutes
(DPPI), respectively

गुरुवार, 1 मई 2014

***आरोग्य नीति बाबत 10 मुख्य मुद्दे

आरोग्य नीति बाबत 10 मुख्य मुद्दे

1. भारतकी पारंपारिक स्वास्थ्य रक्षा तथा उपचार पद्धति भारतीय जलवायु, सांस्कृतिक परिवेश, तथा निसर्गदत्त साधनसंपत्तिके अनुकूल है साथ ही इसका सूक्ष्म ज्ञान विभिन्न प्रकारसे और विभिन्न परिमाणोंमें देशके लोकमानस और लोकज्ञानसे जुडा है । अतः स्वास्थ्यनीतिमें भारतीय पद्धतिका भारी प्रचलन न केवल उपयोगी है वरन इसके बिना हम जनताकी आरोग्यविषयक जरूरतें पूरी नही कर सकते। भारत जैसे बडे देशकी और अत्यंत विषमताओंसे भरे समाजकी स्वास्थ्य संबंधी जरूरतोंके लिये केवल एलोपथी का माध्यम नितान्त अपर्याप्त है इस बातको स्वीकार करना होगा। सभी प्रणालियोंसे मिलाजुला लाभ उठाया जा सके ऐसी नीति अपनानी होगी तभी संपूर्ण लोकसंख्याके लिये आवश्यक स्वास्थ्य सुरक्षा दी जा सकेगी -- Attitudinal Change for Holistic Health Management

2. स्वास्थ्य-सुरक्षाके संबंधमें प्रत्येक व्यक्तिके स्वयंके ज्ञान एवं अनुशासनका महत्व अनन्य है, अतः इस बातको भी स्वीकारना होगा कि स्वास्थ्य-सुरक्षा का आरंभ शिक्षा व्यवस्थासे होता है। शिक्षा प्रणाली में प्रत्येक व्यक्ति की स्व-आरोग्यसंबंधी शिक्षा तथा दूसरोंकी स्वास्थ्य रक्षाके लिये आवश्यक वैद्यकीय शिक्षा दोनोंकी बाबत सुयोग्य दिशा परिवर्तन की आवश्यकता है -- इसे ध्यानमें रखते हुए नई आरोग्य-रक्षक शिक्षा नीति बनानी होगी। यह विषय इतना व्यापक है कि इसी विषयके अलगसे 10 बिंदु बनाने होंगे। Policy changes in Education

3. देशमें आरोग्यसंबंधी रिसर्च अपर्याप्त और भारतीय पद्धतिसंबंधी रिसर्च दुर्दशाग्रस्त है -- इन दोनोंको सुधारनेकी योजनाएँ आवश्यक है। Research Needs

4. देशमें आरोग्यसंबंधी जो सांंख्यिकी एकत्रित की जाती है उसके उद्देश्य एवं उद्देश्य-पूर्ति पर विशेष ध्यान देना होगा तथा स्थानिक निकायोंमें सांख्यिकी-अध्ययन एवं इसपर आधारित स्थानीय जरूरतोंको पूरी करनेवाली नीतियाँ अपनानी होंगी जो आज नही हो रहा। इस प्रक्रियामें विद्यार्थी तथा शोधविद्यार्थियोंका बडा सहभाग आवश्यक होगा। Statistical analysis capabilities and their utilisation for local-level scheme variations

5.आजके उपलब्ध अस्पतालोंमें प्रायोगिकता से आरंभ कर भारतीय प्रणालीकी सिद्धता आधुनिक पॅरॅमीटरसे परखनेसंबेधी प्रयोगोंका आयोजन अत्यावश्यक है। इसके बिना दोनों प्रणालियोंका तालमेल नही बैठाया जा सकता जिसकी चर्चा पहले मुद्देमें की गइ है। Experiment-based synthesis of all systems for Holistic Health Management

6. चूँकि आरोग्य-रक्षा हेतु व्यक्तिगत ज्ञान व अनुशासनके माध्यमसे पचास प्रतिशत जनसंख्याकी निरोगिताको बचाया जा सकता है अतः योग, आहार-प्रणाली आदि निरोगिता-रक्षक योजनाओंको सम्मान, सुविधा एवं बीमाके साथ जोडा जाना चाहिये। इससे वे सभी जन लाभान्वित होंगे जो बिमार नही होते। इस तुलनामें आजकी सभी योजनाओंका लाभ केवल बीमार पडनेसेही मिलता है। एक गलत अर्थनीति भी इस मुद्देपर टिकी है जिसमें अधिक बिमारीको अधिक जीडीपी और अधिक विकासकी संज्ञा दी जाती है।  इसी मुद्देपर सरकारी संस्थानोंमें आर्थिक घोटाले भी होते रहते हैं । positive benefits for good health - change the unwellness-based definition of GDP

7. सरकारकी कृषि नीति तथा पर्यावरण-नीति दोनोंही भारी मात्रामें प्रदूषणको बढावा दे रही हैं जिस कारण अधिकाधिक बिमारियाँ फैल रही हैं। रासायनिक खाद रहित कृषि और देशी वंशकी गायें-बकरियाँ-मुर्गियाँ (पशुधन) के बिना बिमारियाँ पढती रहेंगी। इसी प्रकार आजकी नगर-विकास नीतियाँ भी जीवनको तनाव-ग्रस्त बना रही हैं जो रोगका बडा कारण है। नगर-विकासकी दिशा बदले बगैर इन तनावों एवं बिमारियोंसे बच पाना कठिन है। Paradigm Shift needed in policies for Eco-conservation, Agriculture, Animal Husbandary, and Urbanisation,

8. कानून में 3-4 दिशाओंमें परिवर्तन आवश्यक है - आजका कानून आयुर्वेदको बंधे पानीकी तरह बाँधकर रखना है और किसी भी नये रिसर्छकी संभावना से वंचित करता है। आजका कानून केवल ठप्पाघारी ( डिग्री आधारित) प्रॅक्टिसकी अनुमति देता है -- इसे गुरुकुल आधारित बनाना होगा। साथ ही हमारा आयपीआरका कानून पारंपरिक सामाजिक ज्ञानको विश्व-स्तरीय आक्रमणसे बचानेमें पर्याप्त रूपसे सक्षम नही है। Many legal changes needed, Urgent attemtion to IPR Laws to safeguard the interest of our traditional knowledges

9. स्वास्थ्यविषयक प्रचार-प्रसार हेतु पुस्तकें व इलेक्ट्रॉनिक माध्यमोंको भारतीय भाषाओंमें उपलब्ध कराना। विशेषतः भारतीय पद्धतियोंका ज्ञान जो इतस्ततः बिखरा पडा है उसका संकलन एवं अगली पीढियोंके लिये जतन आवश्यक है। Books, Clip-banks in regional languages and on the whole range of health-keeping systems.

10 आज पश्चिमी देशोंमें भारतीय आरोग्य-रक्षक पद्धतियोंकी लोकप्रियता बढ रही है। अतएव इनके माध्यमसे भारतीय सांस्कृतिक विरासतको विदेशोंमें सही परिप्रेक्ष्यमें पहुँचाया जा सकता है। इस विषयपर चिंतनपूर्वक दूरगामी नीतिकी आवश्यकता है । Use Indian Health Systems as our cultural Ambassadors.abroad.





Bharatiya Health Policy – Points for consideration
I. Protecting n Promoting Health is a ‘Responsibility’ - Action Points:
• At Individual Level
• At Family Level
• At Village Level
• At School level.
II. Participatory; Protective, Preventive &  Promotive  Public Heatlhcare:
• National Preventive and Promotive programs and Budget Allocation for the same.
• Sanitation & Hygiene
• Safe Drinking Water
• Ensuring Balanced Nutrition
• Reproductive &  Child Health
• Prevention of Communicable Disease
• Prevention of Non Communicable Diseases
III. ‘Healthcare’ & ‘Medicare’ are not synonyms.
• Correcting their contextual use [Similar pair = Dharma &  Religion]
• How to avoid their interchangeable use by policy makers.
IV. Clinic & Hospital based Curative Medicare – Action Points:
• Standards for Clinics, Hospitals &  Practice
• Indian Guidelines for Clinical Practice (understanding the context of Indian
research &  resources)
• Holistic Indian Health Care (bringing allopathy, homeopathy, ayurveda,
naturopathy under one umbrella)
• Accreditation
• Linkage with Insurance
• Universal Medicare Insurance
• Ethics & Values in Medicare
V. Role of Yoga in Healthcare:
• Yoga for Positive Health – a wellness initiative
• Yoga Therapy for Chronic Systemic Illnesses [Adhij Vyadhis]
• Yoga in Palliative Care
• Yoga education
VI. Role of Ayurveda in Healthcare
• Ayurveda Education
• Ayurveda in Medicare
VII. Role of Traditional Medicinal Systems:
• How to Preserve & Promote usage of Traditional Medicinal Systems
VIII. Policies Related to Medical Education:
• Work towards holistic health course – AYUSH + Western Medicine. Ayurveda &
Holistic Approach towards Medicare based on Bharatiya Vangmaya.
• Revise syllabus to become more practical for Indian situation. [start the course
with rural postings , include nursing syllabus in first yr, and then go on to
anatomy, physiology pathology pharmacology along with medicine surgery etc]
• Involve and use students in implementing national health programs right from first
year.
• Less of theory more of practical /clinical work
• Make post degree service to the nation compulsory
• Ethics & Values in Medical Eduction
IX. Role of WHO in Bharatiya Healthcare Delivery:
X. Policies related to Medical Research:
• Ethics &  Values in Clinical Research
• Support for original research on Indian knowledge.
• What research should not happen in this country (Ex: Multi Centric Trials from
abroad using our patients as guinea pigs)
XI. Importance of Traditional Life Style and Value System:
• Influence of single parent families on child health
• Violence, depression and lack of emotional support in families
• Violence in Schools
XII. Spiritual Health & its Allied Sciences:
XIII. Quantifying Health needs of Society:
Arogya shiksha for every individual: a)how many teachers for that b) how many
Arogya school for that
Basic medical care for ill: a) how many ills are expected, b) how many GPs required,
c) how many colleges, d) how many Health Social & Communication workers, e)
source of fund social organizations/govt/investors and profit makers
Advanced medical care a) how many pts expected, b) how many subspecialists
required, c) how many colleges, d) funds - social organizations/govt/ investors and
profit makers (insurance), e) teaching opportunity, availabilty of teachers.
XIV. Information Technology & Health:































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